फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें

अमर उजाला संवाद : याद बहुत आती है अब भी बचपन वाली दिवाली

Fri, 02 Nov 2018 01:39 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 02 Nov 2018 01:39 AM IST
विज्ञापन
amar ujala samwad organized in lucknow
अमर उजाला संवाद

बचपन वाली दिवाली, यानी हफ्तों पहले से साफ-सफाई, चूने के कनस्तर में नील मिलाना, दौड़भाग के घर का हर सामान लाना, बिजली की झालर छत पर लटकाना, दूर थोक की दुकान से पटाखे और धनतेरस पर कटोरदान लाना। खील से धान बिनवाना और थाल सजाकर घर-घर मिठाई व प्रसाद बांटना। घर की छत से दगे पटाखे हटाना....।  ऐसी न जाने कितनी अनगिनत मीठी यादें सहेजे हैं हम और आप।

amar ujala samwad organized in lucknow
अमर उजाला संवाद

कुछ समय की कमी, व्यस्तताएं, कुछ जिंदगी का मशीनीकरण, जिसमें हमारा बचपन और उससे जुड़ी हर बात कहीं गुम सी हो गई है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम नई पीढ़ी को वही बेहतर माहौल दें, वो ही उमंग और जज्बा दें, जो हमें बचपन में मिला था। इसी कोशिश में ‘अमर उजाला’ ने एक कदम बढ़ाया और उसके साथ ‘संवाद’ के सफर की साथी बनीं शहर की चुनिंदा हस्तियां। 

amar ujala samwad organized in lucknow
अमर उजाला संवाद
प्रो. साबिरा हबीब ने कहा कि ‘अमर उजाला’ का शुक्रिया जो हमेशा कुछ नया और अनूठा करता है। मैं बचपन से इस सवाल का सामना करती आई हूं कि हम दिवाली क्यों मनाते हैं? मेरा जवाब होता है, भाई दिवाली, ईद, क्रिसमस तो सारे हिंदुस्तान के त्योहार हो चुके हैं, क्यों न मनाएं? मेरे बचपन की दिवाली में नाना के घर की यादें हैं, जहां भाई पटाखे फोड़ते थे। 
विज्ञापन
विज्ञापन
amar ujala samwad organized in lucknow
अमर उजाला संवाद

मालविका हरिओम ने कहा कि बचपन की दीपावली निश्चित रूप से गुम हो रही है, इसे बचाना हमारे हाथ में है। मुझे याद है कि बचपन में एक-दूसरे के घर मिठाई के थाल भेजे जाते थे। थाल ढकने के लिए क्रोएशिए के सुंदर कवर बनाए जाते थे, जिसका हमें बहुत चाव रहता था। किसी के घर से आए थाल में कुछ कमी मिली तो अगली मुलाकात में महिलाएं उस घर का हाल लेतीं थीं।  

विज्ञापन
amar ujala samwad organized in lucknow
अमर उजाला संवाद
पल्लवी फौजदार कहती हैं कि हमारी परंपराएं और शौक ही हमें जीवित रखते हैं। बचपना आज भी मुझमें है और उसी उत्साह से परिवार संग दिवाली मनाती हूं। बचपन में काफी पहले से पैसा जमा करने लगती थी, त्योहार आते-आते सब खर्च। धनतेरस से शुरू हुआ सिलसिला पांच दिन चलता, अब तो एक ही दिन का त्योहार बचा है। कोशिश है, वही माहौल बच्चों को दे सकूं। 
अगली फोटो गैलरी देखें
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed