बचपन वाली दिवाली, यानी हफ्तों पहले से साफ-सफाई, चूने के कनस्तर में नील मिलाना, दौड़भाग के घर का हर सामान लाना, बिजली की झालर छत पर लटकाना, दूर थोक की दुकान से पटाखे और धनतेरस पर कटोरदान लाना। खील से धान बिनवाना और थाल सजाकर घर-घर मिठाई व प्रसाद बांटना। घर की छत से दगे पटाखे हटाना....। ऐसी न जाने कितनी अनगिनत मीठी यादें सहेजे हैं हम और आप।
कुछ समय की कमी, व्यस्तताएं, कुछ जिंदगी का मशीनीकरण, जिसमें हमारा बचपन और उससे जुड़ी हर बात कहीं गुम सी हो गई है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम नई पीढ़ी को वही बेहतर माहौल दें, वो ही उमंग और जज्बा दें, जो हमें बचपन में मिला था। इसी कोशिश में ‘अमर उजाला’ ने एक कदम बढ़ाया और उसके साथ ‘संवाद’ के सफर की साथी बनीं शहर की चुनिंदा हस्तियां।
प्रो. साबिरा हबीब ने कहा कि ‘अमर उजाला’ का शुक्रिया जो हमेशा कुछ नया और अनूठा करता है। मैं बचपन से इस सवाल का सामना करती आई हूं कि हम दिवाली क्यों मनाते हैं? मेरा जवाब होता है, भाई दिवाली, ईद, क्रिसमस तो सारे हिंदुस्तान के त्योहार हो चुके हैं, क्यों न मनाएं? मेरे बचपन की दिवाली में नाना के घर की यादें हैं, जहां भाई पटाखे फोड़ते थे।
मालविका हरिओम ने कहा कि बचपन की दीपावली निश्चित रूप से गुम हो रही है, इसे बचाना हमारे हाथ में है। मुझे याद है कि बचपन में एक-दूसरे के घर मिठाई के थाल भेजे जाते थे। थाल ढकने के लिए क्रोएशिए के सुंदर कवर बनाए जाते थे, जिसका हमें बहुत चाव रहता था। किसी के घर से आए थाल में कुछ कमी मिली तो अगली मुलाकात में महिलाएं उस घर का हाल लेतीं थीं।
पल्लवी फौजदार कहती हैं कि हमारी परंपराएं और शौक ही हमें जीवित रखते हैं। बचपना आज भी मुझमें है और उसी उत्साह से परिवार संग दिवाली मनाती हूं। बचपन में काफी पहले से पैसा जमा करने लगती थी, त्योहार आते-आते सब खर्च। धनतेरस से शुरू हुआ सिलसिला पांच दिन चलता, अब तो एक ही दिन का त्योहार बचा है। कोशिश है, वही माहौल बच्चों को दे सकूं।