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कश्मीर की तस्वीर बदलेगी वानी की शहादत, आतंकी से फौजी बने पहले कश्मीरी को मिलेगा अशोक चक्र
Fri, 25 Jan 2019 04:15 AM IST
संदीप भट्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू/श्रीनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू/श्रीनगर
Published by: संदीप भट्ट
Updated Fri, 25 Jan 2019 04:15 AM IST
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नजीर अहमद वानी
- फोटो : Twitter
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पहले कश्मीरी को अशोक चक्र का सम्मान मिलने से आम कश्मीरियों को फख्र है। उसे अपने जांबाज सिपाही की बहादुरी पर नाज है। उनका मानना है कि लांस नायक नजीर वानी ने न केवल परिवार का बल्कि पूरे कश्मीरी अवाम का नाम ऊंचा कर दिया है और मान बढ़ाया है।
indian army
- फोटो : Twitter
आम तौर पर कश्मीर का नाम आते ही लोगों के दिलो दिमाग में आतंकवाद की गूंज होने लगती है, लेकिन इस सम्मान ने साबित कर दिया है कि कश्मीरी अवाम देश के लिए जान देने से भी पीछे नहीं हट सकता है। अब हर ओर नजीर के बहादुरी के चर्चे हो रहे हैं। उनके गांव में घर पर कोई नहीं है। सभी लोग सम्मान लेने के सिलसिले में दिल्ली गए हैं। कुछ लोग उनके घर बधाई देने के लिए पहुंचे थे, लेकिन ताला देखकर लौट गए।
nazir ahmed
दो आतंकियों को मारने के साथ अपने घायल साथी की बचाई जान
23 नवंबर 2018 को शोपियां के बटगुंड गांव में हुए एनकाउंटर में वानी और उनके साथियों ने हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-ताइबा के कुल छह आतंकियों को मार गिराया था। वानी उस समय 34 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे। लांस नायक वानी ने खुद दो आतंकियों को मारने के साथ ही अपने एक घायल साथी की जान बचाई थी। एनकाउंटर में वह बुरी तरह जख्मी हो गए थे और अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया था। 26 नवंबर को अंतिम संस्कार से पहले वानी को उनके गांव में 21 तोपों की सलामी दी गई थी।
23 नवंबर 2018 को शोपियां के बटगुंड गांव में हुए एनकाउंटर में वानी और उनके साथियों ने हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-ताइबा के कुल छह आतंकियों को मार गिराया था। वानी उस समय 34 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे। लांस नायक वानी ने खुद दो आतंकियों को मारने के साथ ही अपने एक घायल साथी की जान बचाई थी। एनकाउंटर में वह बुरी तरह जख्मी हो गए थे और अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया था। 26 नवंबर को अंतिम संस्कार से पहले वानी को उनके गांव में 21 तोपों की सलामी दी गई थी।
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nazir ahmed wani family
जैकलाई में ज्यादातर समर्पण करने वाले आतंकी
नजीर आतंक का रास्ता छोड़ 2004 में सेना की जम्मू-कश्मीर लाइट इंफेंट्री 162 प्रादेशिक सेना की बटालियन में शामिल हुए थे। इस बटालियन में मुख्य रूप से ऐसे सैनिक शामिल हैं जिन्होंने आतंक का रास्ता छोड़ आत्मसमर्पण किया है। इन लोगों को इख्वानी के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रपति भवन की तरफ से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, ‘वानी में बेहतर सैनिक के सभी गुण थे। वह हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन में शामिल होने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई मौकों पर अपनी जान को खतरे में डालकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।’
नजीर आतंक का रास्ता छोड़ 2004 में सेना की जम्मू-कश्मीर लाइट इंफेंट्री 162 प्रादेशिक सेना की बटालियन में शामिल हुए थे। इस बटालियन में मुख्य रूप से ऐसे सैनिक शामिल हैं जिन्होंने आतंक का रास्ता छोड़ आत्मसमर्पण किया है। इन लोगों को इख्वानी के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रपति भवन की तरफ से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, ‘वानी में बेहतर सैनिक के सभी गुण थे। वह हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन में शामिल होने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई मौकों पर अपनी जान को खतरे में डालकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।’
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nazir ahmed wani family
राज्य में शांति बहाली के लिए हमेशा करते थे प्रयास
टेरिटोरियल आर्मी के अधिकारियों का कहना है कि वह एक बहादुर सैनिक थे। शुरू से ही हीरो की तरह काम करते थे। वह हमेशा अपने राज्य में शांति बहाली के लिए प्रयास करते थे। राष्ट्र के प्रति उनके हृदय में काफी सम्मान था। अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना करते हुए वे दूसरे के लिए प्रेरणा स्रोत थे। वह हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन में शामिल होने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई मौकों पर अपनी जान को खतरे में डालकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।
टेरिटोरियल आर्मी के अधिकारियों का कहना है कि वह एक बहादुर सैनिक थे। शुरू से ही हीरो की तरह काम करते थे। वह हमेशा अपने राज्य में शांति बहाली के लिए प्रयास करते थे। राष्ट्र के प्रति उनके हृदय में काफी सम्मान था। अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना करते हुए वे दूसरे के लिए प्रेरणा स्रोत थे। वह हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन में शामिल होने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय देते हुए कई मौकों पर अपनी जान को खतरे में डालकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।