कारगिल की वो आग जो 20 साल पहले लगी थी वो आज तक बुझी नहीं है। 26 जुलाई हर भारतीयों के गर्व करने का दिन है जब हमारे वीर योद्धाओं ने कारगिल की सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ी पर तिरंगा फहराया था।
पाकिस्तान के धोखे को भारतीय जवानों ने विजय तिलक लगाकर नेस्तनाबूद कर दिया था। ढाई महीने तक चले इस युद्ध में देश ने लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा को खोया था वहीं 1300 से ज्यादा घायल हुए थे। इस युद्ध में सबसे दुखद है उन सैनिकों के बारे में जानना जिन्होंने अपना जीवन खोया उनमें से अधिकांश ने जीवन के 30 वसंत भी नहीं देखे थे।
इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के सामने लेता है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जिन्होंने हंसते-हंसते मातृभूमि की रक्षा के लिए मौत को गले लगा लिया।
आज उन शहीदों से मिलवाएंगे जिन्होंने हंसते-हंसते अपनी जिंदगी देश के नाम कुर्बान कर दी थी।
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परमवीर विक्रम बत्रा
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
कैप्टन विक्रम बतरा वही हैं जिन्होंने कारगिल के प्वांइट 4875 पर तिरंगा फहराते हुए कहा था यह दिल मांगे मोर। वह वीर गति को भी वहीं प्राप्त हुए। विक्रम बतरा 13वीं जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में थे। विक्रम बतरा ने तोलोलिंग पर पाकिस्तानियों द्वारा बनाए गए बंकर पर न केवल कब्जा किया बल्कि गोलियों की परवाह किए बिना ही अपने सैनिकों को बचाने के लिए 7 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों से सीधे भिड़ गए और तिरंगा फहरा कर ही दम लिया। आज उस चोटी को बतरा टॉप के नाम से जाना जाता है। सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र का सम्मान देकर सम्मानित किया।
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योगेन्द्र सिंह यादव
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
कमांडो घटक प्लाटून को गाइड करने वाले ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव थे, जिन्होंने एक चक्र के साथ टाइगर हिल पर एक स्ट्रैटजी बनाकर बंकर पर हमला किया। वह अपनी पलटन के लिए रस्सी का रास्ता बनाते थे। 4 जुलाई को उन्हें कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस के लिए सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया।
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कैप्टन मनोज पांडेय
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
कैप्टन मनोज कुमार पांडे गोरखा राइफल्स के फर्स्ट बटालियन में थे। वह ऑपरेशन विजय के महानायक थे। उन्होंने 11 जून को बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। वहीं उनके ही नेतृत्व में सेना की टुकड़ी ने जॉबर टॉप और खालुबर टॉप पर वापस अपना कब्जा जमाया था। वह दिन तीन जुलाई 1999 का था। पांडेय ने अपनी चोटों की परवाह किए बगैर तिरंगा लहराया। इस अदम्य साहस के लिए उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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कैप्टन अनुज नैय्यर
- फोटो : फाइल, अमर उजाला
कैप्टन अनुज नैय्यर जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में थे। 7 जुलाई 1999 को वह टाइगर हिल पर दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए शहीद हुए। कैप्टन अनुज की वीरता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।