खून चूसने के लिए कुख्यात माने जाने वाले जोंक से इन दिनों कश्मीर घाटी में गंभीर बीमारियों का इलाज किया जा रहा है। वैसे तो ये बात सुनने में थोड़ी अटपटी लगती है, लेकिन ये शत प्रतिशत सही है।
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यही नहीं जोंक से इलाज करने वाले और इलाज करवाने वाले दोनों दावा कर रहे हैं कि इस इलाज के परिणाम अद्भुत हैं। कश्मीर के किस हिस्से में ये इलाज होता है और कौन से लोग जोंक से इलाज करवाते हैं, ये बताने से पहले हम आपको थोड़ा पीछे 19वीं सदी में ले जाना चाहते हैं।
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19वीं सदी के अंत तक जोंक का उपयोग दवा की तरह किया जाता था। एक ओर प्राचीन ग्रीस से शुरू हुई इस पद्धति को भारत के कुछ डॉक्टरों द्वारा मान्यता दी गई हुई है तो वहीं दूसरी ओर कुछ डॉक्टरों द्वारा इलाज की इस पद्धति की लगातार आलोचना की जा रही है।
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समय बदलने के साथ जैसे-जैस देश में बड़े-बड़े अस्पताल खुलते गए और आमजन तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचती गई वैसे वैसे इलाज की ये पद्धति खत्म होती गई, लेकिन आज भी कश्मीर घाटी समेत देश के कई अन्य हिस्सों में इस पद्धति से इजाल किया जाता है।
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जोकों को प्रभावित अंग के ऊपर छोड़ दिया जाता है। जोंक शरीर से 5 मिलीलीटर तक दूषित खून को चूस लेती है। ये प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक पूरा दूषित खून जोंक चूस न लें।