सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हाजीपीर दर्रा को पाकिस्तान ने लंबे समय तक लांच पैड के रूप में इस्तेमाल किया, ताकि घाटी में अशांति फैलाई जा सके। मेजर आरएस दयाल के नेतृत्व में जांबाजों ने इसको अपने कब्जे में लिया था और तिरंगा फहराया था। सोमवार को इस जीत की 55वीं वर्षगांठ और जांबाजों के सम्मान में बारामुला शहर स्थित मुख्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर जांबाजों और वीर नारियों को सम्मानित किया गया।
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जांबाजों और वीर नारियों को किया गया सम्मानित
- फोटो : साकिब नबी
55 साल पहले 28 अगस्त 1965 को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हाजीपीर दर्रे को भारतीय सेना ने अपने कब्जे में लिया था। इससे पहले इस दर्रे को पाकिस्तान लांच पैड के रूप में इस्तेमाल करता था। मेजर आरएस दयाल के नेतृत्व में 1-पैरा की टुकड़ियों ने पाकिस्तानी को सबक सिखाते हुए इस जगह पर तिरंगा फहराया था।
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जांबाजों और वीर नारियों को किया गया सम्मानित
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इस ऐतिहासिक जीत में स्थानीय लोगों ने भी अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी। भारतीय सेना बारामुला जिले के बहादुर लोगों की सेवा और बलिदान को कभी नहीं भूली। यह ऑपरेशन भारतीय सेना और बारामुला जिले के निवासियों के बीच स्नेह, विश्वास, मधुर संबंधों का प्रमाण रहा है।
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जांबाजों और वीर नारियों को किया गया सम्मानित
- फोटो : साकिब नबी
जीत की 55वीं वर्षगांठ पर भारतीय सेना के डैगर डिवीजन ने बारामुला शहर में स्थित मुख्यालय में कई कार्यक्रम आयोजित किए। अमूल्य समर्थन देने वाले स्थानीय लोगों को सेना द्वारा आमंत्रित किया गया और सम्मानित किया गया। वीर नारियों को उनके शौर्य और बलिदान के लिए उपहार और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
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जांबाजों और वीर नारियों को किया गया सम्मानित
- फोटो : साकिब नबी
कार्यक्रम की शुरुआत पुष्पांजलि समारोह के साथ हुई, जिसमें जीओसी 19 इन्फैंट्री डिवीजन और अन्य अधिकारियों ने हाजीपीर ऑपरेशन के बहादुरों को सम्मानित करने के लिए बारामुला युद्ध स्मारक पर माल्यार्पण किया। सम्मान समारोह के बाद, जीओसी 19 इन्फैंट्री डिवीजन ने सभा को संबोधित किया।