Yuva Najariya: युवाओं को अवसाद से बचाने के लिए दें भावनात्मक संबल
विशेषज्ञ की राय
वास्तव में आज का युवा अपेक्षाकृत कहीं अधिक सुविधा संपन्न है। इसके बावजूद वे तनाव, कुंठा, चिंता व अवसाद से घिर जाते हैं। लगातार उदासी, खराब मूड या चिड़चिड़ापन और कम से कम दो सप्ताह तक सामान्य गतिविधियों में रुचि न लेना या किसी बात में खुशी अनुभव न होना आदि अवसाद के मानसिक लक्षण हैं। इसके साथ शारीरिक लक्षण भी हैं जैसे- नींद में खलल, थकान व बेचैनी आदि। संज्ञात्मक लक्षण जैसे अपने और भविष्य के बारे में नकारात्मक विचार, ध्यान केंद्रित करने या निर्णय लेने में कठिनाई होती है। अवसाद संक्षिप्त उदासी या हानि अथवा तनावपूर्ण घटना पर अपेक्षित प्रतिक्रिया से कहीं अधिक है। असफल होने और अकेले पड़ते जाने का निरंतर बढ़ता जा रहा है।
यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है। इसपर गंभीरता के साथ विचार-विमर्श बेहद जरूरी है। वास्तव में अवसाद वृद्धि के लिए किसी एक कारण को इंगित नहीं किया जा सकता है। यह संभवत: वित्तीय दबाव, सामाजिक अलगाव, प्रतिस्पर्धा दौड़ और जलवायु परिवर्तन जैसे अनेक कारकों के कारण है। विश्वव्यापी दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमें परिवार को लेकर पुरातन और आधुनिक प्रतिक्रियाएं नजर आती हैं। वहीं नए मूल्यों का उजागर होना भी नजर आता है। इसपर गंभीरता से विचार-विमर्श की आवश्यकता है। अपनी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर अपने बच्चों के लिए भी अभिभावक समय निकालें। अपने बच्चों की भावनाओं, उलझनों, हताशा, निराशा व परेशानियों के बीच भावनात्मक संबल की एक मजबूत कड़ी जोड़ने की जरूरत है। बाजारवाद व उपभोक्तावादी संस्कृति से बचना बेहद जरूरी है। - डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्रा, पूर्व प्राचार्य
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2023 के आंकड़ों के अनुसार, 11.5 प्रतिशत युवा गंभीर असवाद की चपेट में हैं। हर 7 में से 1 भारतीय बीमार है। इनमें से भी 4.57 करोड़ अवसाद और 4.49 करोड़ लोग चिंता के शिकार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि हर साल 8 लाख लोग मानसिक बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं। इनके अलावा हजारों लोग ऐसे भी होते हैं, जो आत्महत्या की कोशिश करते हैं।
आधुनिक युग में वैश्वीकरण के दौर में जहाँ हमारे लिए अनेकों संभावनाओं का द्वार खोला है वहीं प्रतिस्पर्धा को भी कई गुणा बढ़ा दिया है। इस प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जीतना हर कोई चाहता है ताकि अपने लिए एक बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सके। कुछ यही स्थिति प्रतियोगी बच्चों में भी देखने को मिल रही है। आज हर क्षेत्र में इंजीनीयर, मेडिकल, आर्ट, सीविल सर्विस आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए, प्रतियोगियों को परीक्षा से गुजरना पड़ता है। यह परीक्षा तय करती है कौन सफल है और कौन असफल। यही असफलता का भय और इससे उत्पन्न होने वाली भविष्य की चिंता, निराशा में बदलते समय नहीं लगता जिससे आजकल 14-16 साल की बालिक अवस्था की आयु के बच्चे बढ़ते अवसाद का शिकार हो रहें हैं।
इस अवसाद के और कई कारण है जिसमें प्राथमिक रूप से सीमित सीट होना, प्रतियोगिता में बच्चों की बढ़ती संख्या जिससे प्रतियोगिता कठिन होती है और सफलता दर घट जाता है। इस असफलता के दर को माता-पिता का दबाव , अपेक्षा और सहपाठियों के साथ तुलनात्मक भाव और बढ़ा देता है। और तो और कोचिंग सेंटर्स ने तैयारी के स्तर को इतना बढ़ा दिया है की रेस में बने रहने के लिए घंटों पढ़ाई करनी पड़ती है और खेलकूद का समय भी नहीं मिलता अथवा शारीरिक दुर्बलता मानसिक दुर्बलता को बढ़ा देती है। ऊपर से माता-पिता बच्चों को समय भी नहीं दे पाते क्योंकि रोजी-रोटी की समस्याओं में उलझे रहते हैं। इस स्थिति में कोई सहायता न मिलने पर बच्चे आत्महत्या जैसी गंभीर कदम उठा लेते हैं ।
इस स्थिति को विचार कर सुधार करने की आवश्यकता है। पहले तो सरकार और निजी क्षेत्र में रोजगार को बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि प्रतिस्पर्धा का स्तर कम हो। दूसरा अभिभावकों को परीक्षा में सफलता को जीत हार का मापदंड नहीं बनने देना चाहिए ताकि बच्चों को विश्वास दिलाया जाए की एक परीक्षा में असफलता उनके जीवन और भविष्य का निर्धारण नहीं करेगी। तीसरा बच्चों को नियमित शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए क्योंकि तन स्वस्थ होगा तभी तो मन स्वस्थ होगा। अंततः कोचिंग सेंटर्स के कार्यपालन पर भी सरकार को रस्सी कसनी होगी ताकि प्रतिस्पर्धा का बुखार बच्चों पर ना चढ़े।
आजकल प्रतियोगिता का युग है, हर क्षेत्र में प्रतियोगिता के माध्यम से एक दूसरे को पछाड़कर हर कोई आगे निकलना चाहता है, परंतु पढ़ने वाले छात्रों में इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ रहा है। भारत में मध्यवर्ग के माता पिता अपने बच्चों को अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर या सिविल सेवा का बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं। ज्यादातर वे स्वयं जो काम नहीं कर पाए ' वे अपने बच्चों से करवाने की अपेक्षाएं रखते हैं।
अभिभावकों को बच्चों की रुचि, पढ़ने का उनका स्तर, सोच विचार व उनसे तालमेल करके उनमें आत्म विश्वास पैदा करना, हीन भावना दूर करना, खेलों में डालना या संवाद रखने का समय नहीं होता, बल्कि दूसरों के बच्चों की उच्च सफलता का भूत स्वार रहता है और वे मनोगत तौर पर अपने बच्चों से यही अपेक्षा लेकर चलते हैं। एक कक्षा में कई स्तर के बच्चे होते हैं, उनकी पारिवारिक तौर पर अध्ययन करने के तरीके, माता-पिता से संवाद, घर के वातावरण इत्यादि का अलग-अलग प्रभाव होता है, उनका अंक हासिल करने का स्कोर, सीखने समझने का दृष्टिकोण भी अलग-अलग होता है।
गृह परीक्षाओं व अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में जो छात्र अच्छे अंक ले जाते हैं, उनका हौंसला बढ़ जाता है और वे आत्म विश्वास से भर जाते हैं, कुछ विद्यार्थी कम अंक प्राप्त कर पाते हैं, वे पिछड़ जाते हैं, माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाने की चिंताओं से ग्रस्त होकर हीन भावना के तहत अवसाद के शिकार हो जाते हैं और उनमें पीछे रहने की कुंठा पैदा जाती है। वे इस बात को अपने सहपाठी या संवाद हीनता के कारण अपने माता पिता को बताने का संकोच करते हैं और अपने मन ही मन दुखी होकर अवसाद ग्रस्त होने पर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
जहां-जहां मैडिकल व इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए कोचिंग सेंटर चलाते हैं, वहां शिक्षक अक्सर पीड़ित छात्रों के मनोविकार पर ध्यान देने के बजाए बस एक ही स्पीड से अपना कोर्स पूरा करने पर बल देते रहते हैं। छात्रों से फीडबैक लेने का उनके पास समय ही नहीं होता। सरकारों ने भी हमारी शिक्षा प्रणाली में सफलता का एक ही पैमाना तय कर रखा है कि जो छात्र उच्चतम स्कोर लाएगा वही इस तरह के कोर्सों में दाखिल होगा।
इससे बच्चों की सर्वोत्तम योग्यता का पता नहीं लगता और विषय को समझने के बजाय एक रट्टा लगाकर ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की होड़ रहती है , यह हमारे बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक परिपाटी है।
इसलिए बच्चों के अभिभावक, शिक्षा जगत व हमारी सरकारों को हमारी दोष युक्त शिक्षा प्रणाली तथा परीक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा, ताकि बच्चों की रुचि, उनका स्तर, पारिवारिक आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उनका सर्वांगीण विकास हो, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, कला, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, भूगोल, पेशेवर व्यवसाय इत्यादि विषयों में रुचि के अनुसार आगे बढ़ सकें। इससे उनकी आत्मघात की बीमारी रुक सकती है।
शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा से मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की बढ़ती व्यापकता : बिदामो देवी
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं को अनिवार्य कर दिए जाने के बाद से भारतीय छात्रों को प्रतिस्पर्धा करने और प्रदर्शन करने के लिए भारी तनाव का सामना करना पड़ता है। प्रदर्शन के दबाव को संभालने, माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने और आकांक्षाओं को प्राप्त करने में असमर्थता मनोवैज्ञानिक संकट और बाद में अवसाद का कारण बन सकती है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अकादमिक उत्कृष्टता की निरंतर खोज ने अनजाने में छात्रों के बीच तीव्र दबाव और प्रतिस्पर्धा का माहौल पैदा कर दिया है। शैक्षणिक उपलब्धियों पर अत्यधिक ध्यान देने के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाओं और असफलता के डर ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है।
इसने चिंता, अवसाद और तनाव जैसे मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों में वृद्धि में योगदान दिया है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए कई बार छात्रों पर अच्छा प्रदर्शन करने का लगातार दबाव रहता है। वे अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और आक्रामकता पूर्वक पूर्णता के लिए प्रयास करते हैं। यह अंतर्निहित दबाव मानसिक परेशानी के विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है, जिसमें चिंता, विफलता का डर और कम आत्मसम्मान शामिल है।
गंभीर मामलों में, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आत्म-नुकसान का कारण बन सकती हैं, और यहां तक कि आत्महत्या के प्रयासों के विचार को भी जन्म दे सकती हैं। छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की बढ़ती व्यापकता से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें व्यक्ति, संस्थान और समग्र रूप से समाज शामिल हो। सफलता को फिर से परिभाषित करना और छात्रों को अपने जुनून और रुचियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है। केवल शैक्षणिक उपलब्धियों पर आधारित सफलता की संकीर्ण परिभाषा से आगे बढ़ने से छात्रों को अपनी अद्वितीय प्रतिभा का पता लगाने और अपने चुने हुए रास्ते में पूर्णता पाने का मौका मिलता है।