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Yuva Najariya: राजनीति नहीं, रामलला प्राण प्रतिष्ठा करोड़ों भारतीयों के लिए आस्था का विषय

Thu, 18 Jan 2024 12:30 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Thu, 18 Jan 2024 12:30 AM IST
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Yuva Najariya: Not politics, Ramlala Pran Pratistha is a matter of faith for crores of Indians
- डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

डॉ. सत्यवान सौरभ निवासी भिवानी के अनुसार राजनीति अपनी जगह है, लेकिन राम मंदिर करोड़ों भारतीयों के लिए आस्था का विषय है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, राम जन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आज के भारत का मिजाज, अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है, तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा। आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है। अयोध्या में राममंदिर का निर्माण व भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हमारी गौरवशाली आस्था के क्षण हैं। राम किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं, राम सबके हैं।  



राम मंदिर का निर्माण अनथक संघर्ष का प्रतीक है। यह भारत के लोकतंत्र, उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। लोक जीवन में, साहित्य में, इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शन कलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं। राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करुणा का होना है। राम सबके हैं। वे कबीर के भी हैं, रहीम के भी हैं, वे गांधी के भी हैं, लोहिया के भी हैं। राम का चरित्र सबको बांधता है। अनेक रामायण और रामचरित पर लिखे गए महाकाव्य इसके उदाहरण हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं लिखते हैं- राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है।

विपक्ष का गुट गंभीर राजनीतिक बंधन में फंस गया है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह पर विपक्षी दल सत्ताधारी पार्टी पर हमलावर है। विपक्षी दल कह रहे हैं कि सत्तासीन पार्टी लोकसभा चुनाव को देखते हुए समारोह का इस्तेमाल कर रही है। मंदिर का उद्घाटन चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है। सोचें तो राम मंदिर सबका है क्योंकि राम किसी के साथ भेदभाव नहीं करते है, राम सबके हैं। लेकिन यह बात बार-बार इसलिए दोहराई जा रही है ताकि राम मंदिर आंदोलन से लेकर निर्माण तक विशेष कार्य करने वाली पार्टी को जो श्रेय मिल रहा है उसे कम किया जा सके। विपक्षी राजनीतिक दलों के नेता राममंदिर को सियासी इसलिए बना रहे है ताकि महोत्सव में किसी न किसी प्रकार का विवाद खड़ा हो जाए। इन्हें सुनकर ये कहा जा सकता है कि सियासी लोग अभी तक राम मंदिर के निर्माण के राष्ट्रीय कार्य को मन से स्वीकार नहीं कर पाए हैं। कहा तो ये भी जा रहा है कि राम मंदिर 2024 के सियासी 'दंगल' में अहम रोल निभाएगा। लेकिन ये एक अलग विषय है इसे छोड़ दीजिए ये सोचकर कि आखिर रामजी किसका करेंगे बेड़ा पार ? धर्म में आस्था सर्वोपरि होती है, इसका सियासत से क्या रिश्ता ? वक्त बताएगा.......।

Yuva Najariya: Not politics, Ramlala Pran Pratistha is a matter of faith for crores of Indians
यकीन कुमार, छात्र, जीजेयू - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

गैर राजनीतिक लोग इसे सिर्फ आस्था की नजर से देख रहे : यकीन कुमार
इस बात में कोई संदेह नही है कि भाजपा आम चुनाव के लिए कोई कसर नही छोड़ रही। भाजपा की शुरू से ही  शुरुआत काफी अच्छी रही है। अपने काम का प्रचार या फिर विपक्ष को घेरना काफी सोच समझकर किया गया। अब 2024 लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा राम मंदिर। भारत में करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है अयोध्या जहां राम लला का जन्म हुआ बताया जाता रहा है। लगभग पांच सौ सालों से हिंदुओं को इस दिन का इंतजार था जो पूरा होता नजर आ रहा है।

22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन किया जा रहा है। जोकि देश भर से आस्था के इस स्थान पर जाने के लिए लोगों में काफी उत्साह है। राम मंदिर का कार्य अभी प्रगति पर है। आगे आने वाले दिनों में यही पूरा होने की संभावना है। इससे पहले ही भाजपा सरकार ने इसका उद्घाटन करने का फैसला किया है। चूंकि राम मंदिर का फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया था। इसका निर्माण कार्य किया जाना स्वाभाविक था।

लेकिन जिस तरह से बिना मंदिर पूरा हुए इसका उद्घाटन किया जा रहा रहा है तो भाजपा सरकार इसके जरिए अपना राजनीतिक फायदा साधने की कोशिश कर रही है। क्योंकि आम चुनाव में भाजपा  सबसे बड़े वादे के रूप में इसे पेश करेगी। धार्मिक लोगों की आस्था इससे जुड़ी हुई हैं और मुद्दे पर धार्मिक लोगों की वोट को साधने की कोशिश करेगी। जो हिंदू ज्यादा धार्मिक हैं उनसे से 53% ने 2019 भाजपा को वोट दिया। जबकि 10% ने ही कांग्रेस को वोट दिया। इसके उल्ट जो हिंदू कम धार्मिक हैं उनसे से 37% ने भाजपा को और 18% ने कांग्रेस को वोट दिया। इस बार भी भाजपा निरंतर प्रयासरत की धार्मिक लोगों को उससे साधा जाए। 

राम मंदिर आस्था का प्रतीक है। गैर राजनीतिक लोग इसे सिर्फ आस्था की नजर से देख रहे है। उन्हे खुशी है कि आखिरकार पुराना विवादित मुद्दा सुलझकर मंदिर बन रहा है। मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद ही अगर मंदिर का उद्घाटन किया जाता तो काफी अच्छा होता। जल्दबाजी में यह दिख रहा है कन्ही ना कन्ही भाजपा इससे राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश कर रही है। हिंदू धर्म के अहम दर्जा रखें वाले चार शंकराचार्य में से दो ने सीधे सीधे भाजपा पर आरोप लगाया है कि भाजपा राजनितिक फायदे के लिए जल्दबाजी में उद्घाटन कर रही है। वंही बाकी दो शंकराचार्य ने भी प्रत्यक्ष तौर पर इसमें आने के लिए इस कार्यक्रम में आने के लिए नही कहा। किंतु अब देखना ये है कि क्या भाजपा आम चुनाव से से पहले उद्घाटन कर आस्था की राजनीति कर करना चाह रहे है या नही।

Yuva Najariya: Not politics, Ramlala Pran Pratistha is a matter of faith for crores of Indians
-प्रियंका सौरभ, आर्यनगर, हिसार - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

राम का चरित्र सबको बांधता है : प्रियंका सौरभ
राजनीति अपनी जगह है, लेकिन राम मंदिर करोड़ों भारतीयों के लिए आस्था का विषय है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, राम जन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आज के भारत का मिजाज, अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है, तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा। आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है।

अयोध्या में राममंदिर का निर्माण व भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हमारी गौरवशाली आस्था के क्षण हैं और वर्तमान पीढ़ी बेहद भाग्यशाली है, जो इन ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी बनने जा रही है। सोचे तो राममंदिर सबका है, क्योंकि राम किसी के साथ भेदभाव नहीं करते है, राम सबके है। लेकिन यह बात बार-बार इसलिए दोहराई जा रही है ताकि राम मंदिर आंदोलन से लेकर निर्माण तक भाजपा को जो श्रेय मिल रहा है उसे कम किया जा सके। विपक्षी राजनीतिक दलों के नेता राम मंदिर को सियासी इसलिए बना रहे हैं ताकि महोत्सव में किसी न किसी प्रकार का विवाद खड़ा हो जाए। इन्हें सुनकर ये कहा जा सकता है कि सियासी लोग अभी तक राम मंदिर के निर्माण के राष्ट्रीय कार्य को मन से स्वीकार नहीं कर पाए हैं।

अयोध्या में राम मंदिर अटूट आस्था का विषय है। एक ऐसी आस्था जिसे श्रद्धालु सदियों तक कायम रखते रहे, तब भी जब मंदिर खड़ा नहीं था। आज राम मंदिर का भव्य निर्माण हो रहा है। राम मंदिर का निर्माण एक अनथक संघर्ष का प्रतीक है। यह भारत के लोकतंत्र, उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। लोक जीवन में, साहित्य में, इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शन कलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं।

राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करुणा का होना है। वे सही मायनों में भारतीयता के उच्चा दर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं। लोकमन में व्याप्त इस नायक को सबने अपना आदर्श माना। राम सबके हैं। वे कबीर के भी हैं, रहीम के भी हैं, वे गांधी के भी हैं, लोहिया के भी हैं। राम का चरित्र सबको बांधता है। अनेक रामायण और रामचरित पर लिखे गए महाकाव्य इसके उदाहरण हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं लिखते हैं- राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है।

भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति के ऐसे वटवृक्ष हैं, जिनकी पावन छाया में मानव युग-युग तक जीवन की प्रेरणा और उपदेश लेता रहेगा। जब तक श्रीराम जन-जन के हृदय में जीवित हैं, तब तक भारतीय संस्कृति के मूल तत्व अजर-अमर रहेंगे। श्रीराम भारतीय जन-जीवन में धर्म भावना के प्रतीक हैं, श्रीराम धर्म के साक्षात स्वरूप हैं, धर्म के किसी अंग को देखना है, तो राम का जीवन देखिए, आपको धर्म की असली पहचान हो जाएगी। आज के भारत का मिजाज, अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है, तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा। आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण व भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हमारी गौरवशाली आस्था के क्षण हैं और वर्तमान पीढ़ी बेहद भाग्यशाली है, जो इन ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी बनने जा रही है। आज देखने में आ रहा है कि मंदिरों में दर्शन करने वालों की संख्या में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। लोग मन कि शांति के लिए प्राणयाम, ध्यान धार्मिक अनुष्ठान और सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।

यह भारत का आध्यात्मिक जागरण और आस्था के प्रति समर्पण मनुष्य को नैतिकता की और ले जा रहा है। श्रीराम मंदिर निर्माण के साथ ही भारत में वैसा दृश्य निर्मित हो रहा है, जैसे रामराज्य आ रहा है। राजनीति अपनी जगह है लेकिन राम मंदिर करोड़ों भारतीयों के लिए आस्था का विषय है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, राम जन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आजादी मिलने के समय सोमनाथ मंदिर के साथ ही यह विषय हल हो जाता तो कितना अच्छा होता।

आक्रमण कारियों द्वारा भारत के मंदिरों के साथ क्या किया गया, यह छिपा हुआ तथ्य नहीं है। अच्छा होता कि इस कार्य को सांझी समझ से हल कर लिया जाता। किंतु राजनीतिक आग्रहों ने ऐसा होने नहीं दिया। कई बार जिद्द कुछ देकर नहीं जाती, भरोसा, सद्भाव और भाईचारे पर ग्रहण जरूर लगा देती हैं। अतीत में राम मंदिर के नष्ट होने से लेकर राम जन्मभूमि भूमि को पुनः प्राप्त करने के आंदोलन तक राम मंदिर पर सियासी मंच हावी रहा है। जैसे-जैसे मंदिर के प्रतिष्ठा समारोह की तारीख नजदीक आ रही है, राजनीतिक नेताओं को भेजे गए निमंत्रणों ने कबूतरों के बीच बिल्ली को खड़ा कर दिया है।

फिलहाल नव वर्ष में नई अयोध्या 21वीं सदी के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक उत्कर्ष का गवाह बनने जा रही है। लाखों रामभक्तों और श्रद्धालुओं के मन की मुराद भी पूरी करने जा रही है, जो सैकड़ों वर्षों से रामलला को दिव्य-भव्य नए मंदिर में विराजने का इंतजार कर रहे हैं।  अयोध्या दिन-रात संवर रही है, सज रही है। यह अवसर न सिर्फ इस धार्मिक नगरी के लिए आध्यात्मिक दृष्टि से उत्कर्ष का होगा, बल्कि अवध की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन जाएगा।

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Yuva Najariya: Not politics, Ramlala Pran Pratistha is a matter of faith for crores of Indians
- सुनीता, कीर्ति नगर, भिवानी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
राजनीतिक लाभ के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल करना दुखद और अनुचित: सुनीता
अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद ने सैकड़ों वर्षों तक चला, जब मीर बाकी ने 1528 में मस्जिद बनवाई। लेकिन उसके बाद यह 300 वर्षों तक किसी विवाद का कारण नहीं बना कि यह हिंदू स्थल है। 1853 में ब्रिटिश शासन के दौरान तनाव बढ़ा, जिसने ब्रिटिश को हिंदुओं के पूजा के लिए एक चबूतरा बनाने और मुस्लिमों को मस्जिद में नमाज जारी रखने की इजाजत दी। 

1885 में महंत रघुवीर दास ने मंदिर बनाने के लिए अनुमति मांगी, लेकिन न्यायालय ने साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए इसे अस्वीकार कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद, 22 दिसंबर 1949 की रात को भगवान राम की मूर्तियां बाबरी मस्जिद में रखी गईं, जिससे पहली चरण में पुलिस कार्रवाई हुई। 

इसके बाद, राजनीतिक चलचित्र शुरू हुआ, और भले ही भगवान राम के विभिन्न ऐतिहासिक विवेचनाओं के बावजूद, वह हिंदुओं के लिए पवित्र रहे। दुखद है कि मुद्दा श्रद्धा से नहीं, बल्कि राजनीतिक मंच बन गया है। भारत, विविधता का देश, धार्मिकता और लोकतंत्र के सिद्धांतों पर निर्मित हुआ था। हालांकि, आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों ने ध्यान केंद्रित किया, जिससे मंदिर की अनुमति और मस्जिद के लिए अलग स्थान की घोषणा की गई, राजनीतिक लाभ के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल करना दुखद और अनुचित है। 
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Yuva Najariya: Not politics, Ramlala Pran Pratistha is a matter of faith for crores of Indians
- पवन कुमार, सातरोड़ खुर्द, हिसार - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

राम की जन्मभूमि अयोध्या है, लेकिन वहां पर राम मंदिर नहीं था। वहां पर एक विवादित ढांचा था, जिसको गिराने के बाद वहां पर कानूनी लड़ाई लड़ी गई थी। जब कोर्ट का फैसला आया, तब जाकर वहां पर राम मंदिर बनने की संभावना जागी। यह हिंदुओं के लिए बहुत ही खुशी की बात थी। क्योंकि यह उनकी आस्था से जुड़ा था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे सियासी रंग देना शुरू कर दिया, जो बहुत गलत है। मंदिर तो आस्था का एक प्रतीक होता है। इसमें लोगों की आस्था बसती है। लेकिन राम मंदिर के निमंत्रण को इसलिए नकारा क्योंकि वे समझते हैं कि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। इसे वे वोट बैंक की राजनीति समझते हैं। मंदिर तो एक माध्यम है भाईचारे को बढ़ाने के लिए, यह एक आस्था का संगम है। इसे राजनीति के चश्मे से नहीं तोलना चाहिए। इसे हमें आस्था के समारोह के रूप में स्वीकार करना चाहिए। ताकि समाज में एक अनूठी मिसाल कायम की जा सके। राम मंदिर को एक सियासी मंच न बनाकर आस्था का समारोह बनाना चाहिए।

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