हरियाणा के हिसार जिले के गांव नंगथला निवासी पर्यावरण प्रेमी रमेश ने पत्नी, दो बेटियों व बेटे की हत्या करने के बाद अपने कमरे की दीवार पर चाेक से लिखा कि सब सो रहे हैं, अब शांति है। उसने अपनी पत्नी व बच्चों को रजाई ओढ़ा दी, ताकि किसी को कोई शक न हो और उसके बाद अंदर के दोनों कमरों के दरवाजे खुले छोड़ दिए और बाहर का मेन गेट बंद कर निकल गया। सड़क पर जा रहा हूं, शरीर का बोझ खत्म करना है। सुबह के चार बजे चुके हैं। घर से निकल चुका हूं। इतनी सर्दी में सबको परेशान करके जा रहा हूं, माफ करना, सबसे माफी। यह वह आखिरी दो लाइन हैं जो रमेश वर्मा ने अपनी दो बेटियों, बेटे, पत्नी की हत्या के बाद आत्महत्या करने से पहले लिखी। वारदात की सूचना मिलने पर सोमवार सुबह पुलिस जब रमेश वर्मा के घर पहुंची तो कॉपी पर लिखा दो पेज का सुसाइड नोट बरामद हुआ। पुलिस के अनुसार रमेश ने 4 से 4:30 के बीच किसी वाहन के सामने कूदकर आत्महत्या की है। मौके पर वाहन के टायर के कई मीटर तक रगड़ के निशान हैं, जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि चालक ने हादसे से बचने का प्रयास किया।
तीन बच्चों व पत्नी की हत्या के बाद की आत्महत्या: दीवार पर लिखा सब सो गए हैं, अब सब शांत है... 11 पन्ने के सुसाइड नोट में लिखी ये बातें
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तीन दिन से सोया नहीं, अब मन आजाद होना चाहता है
जिंदगी के आखिरी दिनों में बहुत मन लगाने की कोशिश की थी। मशीनें खरीदी, दुकान भी खरीद ली थी। दो लाख दे दिए थे और भी बहुत पैसा आ रहा था। चुनाव मैं बहुत पैसा कई लाख आए थे लेकिन शरीर, दिमाग हार मान चुके थे। मन अब आजाद होना चाहता था। कोई सुख कोई बात अब रोक नहीं सकता। रोज रात को यह सब सोचता हूं। तीन दिन से पूरी रात जागा हूं आंखों में नींद नहीं है। मन को बहुत लालच दिए लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। अब रुकना मुश्किल था। आखिर दिमाग का बोझ उतर ही गया। कोई अफसोस, कोई दुख नहीं। तीन बार बिजली के तार मुंह में लिए मगर करंट नहीं लगा। अब याद आया मुझे तो करंट लगता ही नहीं था।
11 पेज के सुसाइड नोट में यह लिखा
बेटे की कॉपी में 11 पेज का सुसाइड नोट लिखा है। उसमें लिखा है कि जयदेव के लिए। आप सब से माफी जयदेव जी बहुत दुख दे रहा हूं लेकिन मासूम भी भोली भी सविता और नादान व बच्चों को बेरहम दुनिया में अकेला नहीं छोड़ सकता इनको भी साथ ले गया हूं। संदीप से भी माफी पिछले साल आपको बताया था लेकिन ये सब होना ही था। ...आपका रमेश
मुझे मोक्ष शांति चाहिए थी। जो भी पढ़ रहा है मुझे अपराधी न समझे रात के 11 बज चुके हैं न दुख है, न डर, न सर्दी लग रही है पता नहीं चला। 2 घंटे लगे सब करने में सबको नींद की गोलियां दी है। आज मेरी लिखाई भी बदली बदली है जो भी किया कोई अचानक हुई घटना है ऐसा नहीं है न कोई डर था न कर्ज है। 50 हजार तक कमा रहा हूं जिंदगी के सब सपने पूरे कर चुका हूं लेकिन हुआ क्यों।
सन्यासी बनना चाहता था पर गृहस्थी से निकल नहीं सका
मैं बचपन से सबसे अलग था जब होश संभाला तो संसारिक सुख की बजाय दुनिया को अलग नजर से देखता। दुनिया की असलियत को समझता। मेरा मन पिछले 15 साल से सन्यासी था मैं मोक्ष मुक्ति चाहता था। मगर गृहस्थी से निकल नहीं सका। धीरे-धीरे मेरा दिमाग बदलता गया। मेरी सविता भी मेरी तरह ही बस जो है उसी में खुश थी। खैर हमने भाई को माफ कर दिया मैं तो फकीरी में सन्यासी बनकर जी रहा था।
पिछले 10-15 साल में कई बार घर से निकल सन्यास लेने की सोच चुका था मगर 2 साल पहले हुए हादसे ने बहुत जल्दी मजबूत कर दिया शरीर कमजोर हो चुका था। गले में बहुत दिक्कत थी। सांस लेने में खाने में सोने में बोलने में दिमाग भी बिल्कुल शांत हो रहा था। पिछले साल मैंने सबसे सन्यास मांगा मुझे मुक्ति दे दो। मैं अक्सर बीवी के आगे रोता था मुझे जाने दो मगर वो रोक लेती थी। आखिर 4-5 दिन पहले दिमाग ने हार मान ली। पत्नी को बताया उसने मेरी हां में हां मिलाई और आखिरी समय साथ रहने की बोली।
- पहली तो पूरी कर चुका हूं, सबको साथ ले जा रहा हूं।
- अस्पताल से सीधे श्मशान ले जाया जाए।
- परिवार में कोई नहीं सन्यासी हो चुका हूं, अब पीछे कोई नहीं है रोने वाला।
- अस्थियां हरिद्वार की बजाय श्मशान के पेड़ पौधों में डाल दी जाएं। हमको इतनी शांति चाहिए।
- मेरे घर को हमेशा बंद रखा जाए, मेरी आत्मा यहीं शांति से रहेगी।
- दुकान का सामान बेचकर किसी का बकाया है उनको दे दिया जाए बाकि सब कबाड़ में बेचकर दान कर देना।
- मुझे सन्यासी की तरह विदा करें बस कुछ छोड़ रहा हूं। पीछे से कोई नहीं छोड़ गया हूं जो है वो सब मेरे साथ जा रहा है।
- मैं कोई मानसिक रोगी नहीं हूं बस शांति चाहता हूं।