16 दिसंबर 2012 को दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में निर्भया के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर सड़क पर फेंक दिया गया था। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने वाले छह दरिंदों में एक उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का रहने वाला पवन गुप्ता उर्फ कालू भी शामिल था। गौरतलब है कि पवन अपने आप को बचाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा है लेकिन सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया के दोषी पवन गुप्ता की सुधारात्मक याचिका (क्यूरेटिव याचिका) खारिज कर दी है। अब उसे जल्द ही फांसी पर लटाया जा सकता है।
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निर्भया केसः निर्भया का दोषी पवन गुप्ता
- फोटो : सोशल मीडिया
जिस चलती बस में छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ था, उस समय पवन भी अपने दोस्तों के साथ उसी बस में था। वह बस्ती जिले के जगन्नाथपुर का निवासी है। उसके परिवार के लोग तो दिल्ली के आरकेपुरम रविदास कैंप में रहते हैं। पवन के बचपन के दोस्त और अन्य युवक बताते हैं कि कालू को क्रिकेट का बहुत शौक था। उसने महादेवा में नमकीन बनाने की फैक्ट्री खोली लेकिन वह चल नहीं पाई। इसके बाद वह दिल्ली चला गया और वहां जूस का व्यवसाय करने लगा।
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निर्भया केसः बाएं निर्भया की मां, दाएं निर्भया का दोषी पवन।
- फोटो : अमर उजाला
पवन के पिता, दादी और बहन आदि परिवार के सदस्य आरकेपुरम इलाके में उसके साथ संत रविदास कैंप में रहते थे। उसकी बहन और दादी ने 2017 में फांसी की सजा के बाद अदालत और कानून पर टिप्पणी की थी। दोनों का मानना था कि उन्हें न्याय पाने के लिए प्रयास करने का मौका नहीं दिया गया। पवन के चाचा भी दिल्ली में रहकर काम करते हैं। निर्भया कांड के बाद पवन की मां की मौत पर पिता एक बार अपने गांव जगन्नाथपुर आए थे, लेकिन वह क्रिया-कर्म के बाद लौट गए।
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निर्भया केसः निर्भया का दोषी पवन गुप्ता का महादेवा चौराहे के पास बना घर।
- फोटो : अमर उजाला।
दो भाई व दो बहन में सबसे बड़ा पवन दुकानदारी के अलावा ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी कर रहा था। पिता ने यहां लालगंज थाने के महादेवा चौराहे के पास गांव में भी जमीन ली थी और उस पर मकान बनवाना शुरू किया था, मगर 16 दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद से काम ठप हो गया।
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निर्भया केसः पूरा देश पवन को फांसी पर लटाकाने की मांग कर रहा है।
- फोटो : अमर उजाला
मौजूदा समय में वह खंडहर जैसा दिखता है। निचली अदालत ने 10 सितंबर 2013 में जब उसे फांसी की सजा सुनाई तो गांव में लोगों ने समर्थन किया लेकिन दादी ने उसके छूटने की बात की थी। 13 मार्च 2014 में हाईकोर्ट व 27 मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा बरकरार रखी। अब क्यूरेटिव याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर परिवार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।