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चौरीचौरा घटना ने रखी थी 'स्वराज पार्टी' की नींव, महात्मा गांधी की इस घोषणा से नाराज हुए थे नेता

Thu, 04 Feb 2021 08:53 AM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 04 Feb 2021 08:53 AM IST
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Chauri Chaura incident established Swaraj Party due to Mahatma ganbdhi return Declaration of non-cooperation
चौराचौरा कांड। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
चौरीचौरा की घटना आजादी के आंदोलन में परिवर्तनकारी साबित हुई। इसके बाद आम जनता में जहां देशप्रेम की भावना का संचार हुआ, वहीं आजादी के आंदोलन को ठेस भी लगी। घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। इससे तमाम आंदोलनकारियों में नाराजगी बढ़ गई। मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अली बंधुओं ने इसे जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताया। परिणाम यह हुआ कि 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में चितरंजन दास ने स्वराज पार्टी की नींव रख दी।
Chauri Chaura incident established Swaraj Party due to Mahatma ganbdhi return Declaration of non-cooperation
गोरखपुर में महात्मा गांधी।(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

दरअसल, 1921 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। उन्हीं दिनों प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आए, जिनका हर जगह हड़ताल से स्वागत हुआ। सरकार गांधी जी से समझौता करना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इस प्रकार आजादी के आंदोलन के इतिहास में यह पहला अवसर था जब सभी भारतीय अंग्रेज सरकार का विरोध कर रहे थे। जनता का आंदोलन बन गया था। गांधीजी ने वायसराय को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने सात दिनों के अंदर अपनी दमनकारी नीति में परिवर्तन नहीं किया तो 'कर न दो' आंदोलन शुरू किया जाएगा।

Chauri Chaura incident established Swaraj Party due to Mahatma ganbdhi return Declaration of non-cooperation
चौरी-चौरा कांड।(फाइल) - फोटो : अमर उजाला
इसी बीच चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा के भोपा बाजार में सत्याग्रही इकट्ठा हुए। थाने के सामने से जुलूस की शक्ल में गुजर रहे थे तो तत्कालीन थानेदार ने जुलूस को अवैध मजमा घोषित कर दिया। एक सिपाही ने वालंटियर की गांधी टोपी को पांव से रौंद दिया। गांधी टोपी को रौंदता देख सत्याग्रही ने विरोध किया तो पुलिस ने फायरिंग कर दी। इसमें तीन सत्याग्रही मौके पर शहीद हो गए, जबकि 50 से ज्यादा घायल हो गए। इसके बाद सत्याग्रहियों ने थाने को घेरकर आग लगा दी, जिसमें 21 सिपाही और एक थानेदार जिंदा जल गए। घटना से नाराज गांधी जी ने आंदोलन वापिस ले लिया। गांधी जी के इस कदम को बहुत से नेताओं ने गलत माना। इनका मानना था कि जिस समय जनता का मनोबल ऊंचा था उस समय कदम पीछे नहीं करने चाहिए थे। असहयोग आंदोलन भले ही वापस हो गया, लेकिन लोगों में नई चेतना का संचार हुआ। भारतीयों में देशप्रेम की भावना हिलोरे लेने लगी। जनता में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम पैदा हुआ और लोग विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने लगे।
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Chauri Chaura incident established Swaraj Party due to Mahatma ganbdhi return Declaration of non-cooperation
इसी जहग पर हुआ था चौरीचौरा कांड। - फोटो : अमर उजाला।
स्वराज दल की स्थापना
साल 1922 में असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगित होने से आजादी के आंदोलन में अनिश्चितता और गतिहीनता आ गई। अधिकतर नेता गांधी जी के इस कार्य से क्षुब्ध थे। गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के शिक्षक प्रो. मुकुंद शरण त्रिपानी का कहना है कि कुछ सत्याग्रहियों का मत था कि आगामी चुनावों में भाग लेकर काउंसिलों में पहुंच कर अंदर से विरोध किया जाए। दूसरी तरफ, कुछ कांग्रेस की नीति में कोई परिवर्तन नहीं चाहते थे। पहली विचारधारा के नेता चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू तथा वल्लभ भाई पटेल थे। 1922 में गया में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया। सीआर दास ने अध्यक्ष पद से अपनी नीति को प्रस्तुत किया, जिसे गांधीवादी विचारकों ने अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर 1923 में स्वराज पार्टी के गठन की घोषणा की। हालांकि, मौलाना आजाद के प्रयासों से 1923 में दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में स्वराज पार्टी के प्रोग्राम को स्वीकार किया गया और उन्हें काउंसिलों के लिए चुनाव लड़ने की आज्ञा दे दी गई।
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चौरीचौरा स्मारक। - फोटो : अमर उजाला
फ्रांस के बास्तील की घटना से होती है चौरीचौरी की तुलना
कई इतिहासकार चौरीचौरा की घटना की तुलना बास्तील के किले पर फ्रांस की जनता के हमले और कब्जे से भी करते हैं। 14 जुलाई 1789 को फ्रांस की विद्रोही जनता ने फ्रांसीसी राजसत्ता के गढ़ बास्तील के किले पर पर कब्जा कर लिया था। इसी घटना ने फ्रांसीसी क्रांति का आगाज किया था।
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