भारत में दूरदर्शन 60 बरस से भी ज्यादा का हो गया है। एक जमाने में जब मनोरंजन जगत आज की तरह सुदृढ़ और विलक्षित नहीं था और अपना एक रूप लेने की कोशिश ही कर रहा था उस वक्त दूरदर्शन ने कई ऐसे कार्यक्रम दे दिए, जिसकी स्मृति भारतीय दर्शकों के मस्तिष्क पर अब तक अमिट है। रामायण, महाभारत, शक्तिमान, मालगुड़ी डेज और गली-गली सिम सिम के किस्से व कहानियां तो आपने कई बार सुनी होंगी, लेकिन आज हम आपको यादों के उस झरोखे से भी परे ले चलेंगे।
दूरदर्शन के इन कार्यक्रमों को भूल चुके होंगे आप, तब आवाज सुनते ही दौड़े चले आते थे बच्चे
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आज हम दूरदर्शन की कुछ ऐसी नायाब सिग्नेचर ट्यून, लघु फिल्म और कार्यक्रम का जिक्र करेंगे, जिसकी यादें शायद आपके जहन के किसी कोने में धूमिल हो गई हों। इनमें सबसे पहले बात करेंगे खुद दूरदर्शन के सिग्नेचर ट्यून और मोंटाज की। इसकी धुन में एक खास तरह आकर्षण था, जिसे सुनकर ही दर्शक खिंचे चले आते थे। कहीं दूर से भी ये आवाज कानों में पड़ जाए तो मन उत्सुक हो उठता था कि हम भी थोड़ा टीवी देख लेते।
ऑल इंडिया रेडिया यानी आकाशवाणी। 'बहुजनहिताय बहुजनसुखाय' के उद्देश्य से लाया गया आकाशवाणी 1957 में राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो प्रसारण के तौर पर पहचान बना रहा था। इस दौरान इस प्रथम रेडियो चैनल की विशेष प्रकार की धुन श्रोताओं का मन कौतूहल से भर देती थी। तब टीवी का युग शुरू नहीं हुआ था। इसलिए लोग आकाशवाणी के कार्यक्रमों का इंतजार किया करते थे। ये ट्यून एक बार फिर से यादों को ताजा कर देती है।
फिल्म डिवीजन ऑफ इंडिया यानी एफडीआई की ओर से एक समय में प्रेरणादायक और रोचक एनिमेटेड शॉर्ट फिल्में बनाई गई थीं। समाज को सकारात्मक और प्रेरणायादयक संदेश देने के लिए कई छोटे-बड़े वीडियो बनाकर टीवी पर प्रसारित किए जाते थे। इनमें ‘ट्री ऑफ यूनिटी (1972)’, ‘एक चिड़िया अनेक चिड़िया (1974)’, और ’एक अनेक और एकता (1974) जैसी कई शॉर्ट फिल्में शामिल थीं, जिन्हें एनिमेशन के जरिए दिखाया गया था।
दूरदर्शन पर 1993 में प्रसारित किए जाने वाले ‘जंगल बुक’ कार्यक्रम को आज भी कई लोग याद करते होंगे। उस समय की पीढ़ी के लोग भले ही अब बच्चे नहीं रहे मगर जब भी अपना बचपन याद करते होंगे तो उन्हें मोगली जरूर याद आता होगा। ‘जंगल जंगल बात चली है पता चला है…’ ये गाना सभी को अब भी गुदगुदा देता है।