चपरासी बनने को तैयार है एशियन गेम्स का पदक विजेता, कभी ऑटोवाला बनता तो कभी चायवाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हरीश ने बताया कि उनके परिवार के आय का श्रोत काफी कम है। खेल की प्रेक्टिस करने के अलावा वे कभी पिता का ऑटो चलाकर व चाय की दुकान पर बैठकर भाई की मदद करते हैं। दोनों काम करते हुए वे खेल का अभ्यास करते थे। हरीश परिवार के बेहतर भविष्य के लिए अच्छी नौकरी करना चाहते हैं। ऐसे में उन्हें बस एक नौकरी चाहिए, वह चपरासी की भी नौकरी कर लेंगे, ताकि परिवार का सहारा बन सकें।
टायर-ट्यूब को काटकर बनाता था बॉल
हरीश के पिता मोहन लाल जसवाल का कहना है कि बेटे ने जब खेल की शुरुआत की तो कोई मदद के लिए आगे नहीं आया है। टायर-ट्यूब को काटकर वह बॉल बनाता था और छोटे से पार्क में दिनभर खेलता था। एशियन गेम्स में सेपकटकरा (वॉलीबॉल की तरह पैरों से खेला जाने वाला खेल) में उसने कांस्य पदक भी जीता। अब उसे एक अदद नौकरी की चाहत है। परिवार में उसकी एक बहन व एक छोटा भाई दृष्टिहीन है। हरीश की मां इंद्रा देवी व उनकी बुआ ने बताया कि वे कोठियों में काम करके जीविका चलाती हैं। हरीश बचपन में कोठियों से मिलने वाले खाने का इंतजार रहता और वह बस स्टैंड पर उनका इंतजार करता रहता था। उनका कहना है कि हरीश को नौकरी मिल जाए तो परिवार का भरण-पोषण ठीक से हो जाए।
हरीश को छोड़ टीम के सभी खिलाड़ियों को मिली नौकरी
बड़े भाई नवीन का कहना है कि कोच हेमराज ने हरीश को काफी प्रोत्साहन दिया। खुद वह हमारे यहां पहुंचे और आईजीआई स्टेडियम ले जाकर ट्रेनिंग देना शुरू किया। पहले खेल के लिए हर महीने 600 रुपये मिलते थे। अब यह बढ़कर एक हजार रुपये हो गया है। शूज व खेल के लिए अन्य किट्स भी मिलती है। पदक जीतने पर पूरी टीम को सरकार ने 60 लाख रुपया देने की घोषणा की । मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी प्रत्येक खिलाड़ी को 50 लाख रुपया देने को कहा है। हरीश के टीम के सभी खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी मिली है, सिर्फ हरीश को अभी तक नौकरी नहीं मिली।