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भारत-पाकिस्तान बॉर्डर की निगहेबान हैं ये बेटियां, इधर पलक झपकी और उधर दुश्मन ढेर...
सीमा एस आनंद/अमर उजाला, अटारी बार्डर(पंजाब)
Updated Wed, 15 Aug 2018 08:18 AM IST
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महिला बीएसएफ जवान
72वें स्वतंत्रता दिवस पर देश में एक खास बदवाल हुआ, वो ये कि अब भारत-पाकिस्तान बॉर्डर बेटियों की निगहेबानी में है। जो इतनी तेज तर्रार हैं कि इधर पलक झपकी और उधर दुश्मन ढेर।
महिला बीएसएफ जवान
2008 में महिलाओं को बीएसएफ में शामिल किया गया था। 2013 में बीएसएफ ने बॉर्डर पर महिलाओं की तैनाती का फैसला लिया गया। इस समय करीब 100 बीएसएफ महिला कर्मी सरहद पर तैनात हैं। हथियारों से लैस, पैनी नजर ऐसी कि दुश्मन आंख उठाकर नहीं देख सकता। बीएसएफ की ये महिला प्रहरी दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हर समय तैयार रहती हैं। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि चाहे गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात, वे हर प्रतिकूल मौसम में देश की सेवा और बलिदान को तैयार रहती हैं।
महिला बीएसएफ जवान
वाघा बॉर्डर पर तैनात कांस्टेबल पुष्पेन्द्र, सुनन्दा, सागरिका, धनश्री, सुनीता चौधरी, दिलराज गिल, मंजू चौधरी कहती हैं कि उन्होंने देश की सुरक्षा करने की जो शपथ ली है, उसे वे सब अंतिम सांस तक निभाएंगी। सोच समझकर ही सेना में आने का फैसला लिया। यहां आकर पता चला कि सेना में महिलाओं का कितना सम्मान है। पहले सिर्फ ऑफिशियल या नर्सिंग जॉब के लिए महिलाओं को रखा जाता है,लेकिन अब बॉर्डर पर दुश्मनों की आंखों में आंखें डालकर बीएसएफ की महिला टुकड़ी खड़ी है।
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महिला बीएसएफ जवान
इनके कंधों पर है दोहरी जिम्मेदारी
कांस्टेबल कुलविंदर कौर की साढ़े तीन साल की बेटी है। अपनी ड्यूटी से बचा पूरा समय वह अपनी मासूम बेटी के साथ ही बिताती हैं। उनकी सास भी इसमें सहयोग करती हैं। इसी तरह राजस्थान की मंजू चौधरी की शादी तीन साल पहले हुई थी। अब डेढ़ साल का बेटा है। दोनों बताती हैं कि देश सेवा पहले है बाकी जिम्मेदारियां उसके बाद। बीएसएफ में उनकी हर जरूरत का पूरा ध्यान रखा जाता है। मंजू बताती हैं कि मेरे फूफाजी फौज में थे। उनकी वर्दी देखकर उनमें सेना में जाने का जज्बा जागा। पिता का सपोर्ट मिला और वह बीएसएफ में भर्ती हो गई।
कांस्टेबल कुलविंदर कौर की साढ़े तीन साल की बेटी है। अपनी ड्यूटी से बचा पूरा समय वह अपनी मासूम बेटी के साथ ही बिताती हैं। उनकी सास भी इसमें सहयोग करती हैं। इसी तरह राजस्थान की मंजू चौधरी की शादी तीन साल पहले हुई थी। अब डेढ़ साल का बेटा है। दोनों बताती हैं कि देश सेवा पहले है बाकी जिम्मेदारियां उसके बाद। बीएसएफ में उनकी हर जरूरत का पूरा ध्यान रखा जाता है। मंजू बताती हैं कि मेरे फूफाजी फौज में थे। उनकी वर्दी देखकर उनमें सेना में जाने का जज्बा जागा। पिता का सपोर्ट मिला और वह बीएसएफ में भर्ती हो गई।
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महिला बीएसएफ जवान
कुछ अलग करके दिखाना था इसलिए यह फील्ड चुना
फाजिल्का की दिलराज गिल का कहना है कि 12वीं के बाद घरवालों ने आगे पढ़ाने से मना कर दिया। उन्होंने घर में बैठने के बजाय जॉब करने की ठान ली। सेना में जाने का सपना था, सो पूरी लगन से तैयारियों में जुट गई। आखिरकार सपना पूरा हुआ और वह बीएसएफ की महिला बटालियन का हिस्सा बन गई। आज वर्दी पहनकर जब बॉर्डर पर खड़ी होती हूं तो अपने फैसले पर गर्व होता है। गांव में भी लोग उस पर गर्व करते हैं।
फाजिल्का की दिलराज गिल का कहना है कि 12वीं के बाद घरवालों ने आगे पढ़ाने से मना कर दिया। उन्होंने घर में बैठने के बजाय जॉब करने की ठान ली। सेना में जाने का सपना था, सो पूरी लगन से तैयारियों में जुट गई। आखिरकार सपना पूरा हुआ और वह बीएसएफ की महिला बटालियन का हिस्सा बन गई। आज वर्दी पहनकर जब बॉर्डर पर खड़ी होती हूं तो अपने फैसले पर गर्व होता है। गांव में भी लोग उस पर गर्व करते हैं।