सिर पर गठरी, गोद में मासूम। न सिर पर छत न खाने को दाना। चिलचिलाती धूप, तवे की तरह तपती सड़कें... पर जख्मों को भूलकर घर लौटने को मजबूर हैं प्रवासी मजदूर। तस्वीरों में देखिए सिसकती जिंदगी, बेबसी का सफर और दुश्वारियों की डगर, आपकी आंखें भर आएंगी देखकर।
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जेब में पैसे नहीं, इसलिए रस्सी से बांधा मास्क
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना महामारी से तो क्या निपटेंगे, देश पहले पलायन और भूखमरी से निपट ले तो भला हो। पंजाब और हरियाणा से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में अपने घरों के लिए निकले मजदूरों के दुख दर्द को साझा किया अमर उजाला ने।
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तपती गर्मी, पैदल चलना...भूख-प्यास तो लगेगी ही
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42 डिग्री सेल्सियस का तापमान, कभी खाने को मिल जाता तो कभी नहीं। न मौत का डर न पुलिस की लाठियों की फिक्र, चिंता है तो सिर्फ घर पहुंचने की। क्योंकि आर्थिक रूप से खोने को कुछ बचा नहीं। जो था, वो लॉकडाउन के दौरान बिक गया।
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जहां जगह मिली वहीं सो गए बच्चे...
- फोटो : अमर उजाला
बच्चों की भूख ने हिम्मत तोड़ दी, इसलिए घर जाने के लिए निकले। जैसे भी हो बस घर पहुंचना है। कोरोना के रूप में आई महामारी ने ऐसे जख्म दे दिए, जिन्हें भरने में बरसों लग जाएंगे। जिन सड़कों पर कभी गाड़ियां दौड़ती थीं, उन पर जिंदगी नंगे पांव चल रही है।
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चल-चलकर थक गए तो सामान के ढेर पर ही सो गया
- फोटो : अमर उजाला
अब लोग लौट रहे हैं उसी डगर की ओर, जिसे वे रोजी रोटी के चक्कर में छोड़ आए थे। बेबसी के किस्से ऐसे हैं, सुनकर कलेजा कांप जाए। घर जाने को निकल तो गए हैं, लेकिन सुरक्षित अपनों तक पहुंचने की चिंता अलग से है। किसी की मां इंतजार कर रही तो किसी की पत्नी।