मौका राष्ट्रीय खेल दिवस का और पहली बार एक की परिवार के दो लोगों को मिला खेल अवार्ड, वो भी तायाऔर भतीजी को। जानिए इनकी सफलता की कहानी।
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महाबीर फोगट और विनेश फोगट को मिला खेल अवार्ड
जी हां, बात हो रही है बलाली के पहलवान पिता महाबीर फोगट और उनकी भतीजी विनेश फोगट की। दोनों को आज राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खेल अवार्ड से सम्मानित किया। महाबीर फोगट को द्रोणाचार्य अवॉर्ड मिला, जबकि उनके भाई की बेटी विनेश फोगाट को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया।
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महाबीर फोगट और विनेश फोगट को मिला खेल अवार्ड
महाबीर फोगट ऐसे बने द्रोणाचार्यः महाबीर फोगट 10-11 साल की उम्र में ही अखाड़ों तक जाने लगे। 14-15 साल की उम्र तक कई दांव-पेंच सीख लिए। अपने से बड़े पहलवानों को भी आसानी से चित कर देते। गांवों के दंगलों के बाद महाबीर 1979 में दिल्ली के चंदगी राम अखाड़ा पहुंचे। यही से पहलवानी की असली ट्रेनिंग शुरू हुई। शादी के बाद महाबीर गांव लौट आए और विश्व में कुश्ती को पहचान दिलाई।
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महाबीर फोगट और विनेश फोगट को मिला खेल अवार्ड
अखाड़ा चलाने के लिए लिया कर्ज: महाबीर फोगट की चारों बेटियां आज इंटरनेशनल पहलवान हैं, लेकिन उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। अखाड़ा चलाने के लिए और बेटियों की डाइट व ट्रेनिंग के खर्चे के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा। बता दें कि एक पहलवान की ट्रेनिंग और खान पान पर करीब 50 से 60 हजार रुपए हर माह का खर्च आता है। इसके लिए उन्होंने अपना घर और खेती भी दांव पर लगा दी।
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महाबीर फोगट और विनेश फोगट को मिला खेल अवार्ड
बेटियों को बनाया अंतर्राष्ट्रीय पहलवानः 1988 में गीता का जन्म हुआ तो ठान लिया की इसे पहलवान बनाएंगे। 11 साल की होते ही गीता को कड़ा प्रशिक्षण देने लगे। दूसरी बेटी बबीता भी बड़ी बहन के नक्शे कदम पर थी। इसके बाद रितु और संगीता भी पहलवानी करने लगीं। विनेश और प्रियंका महाबीर के भाई की बेटियां हैं। भाई के असमय निधन के बाद महाबीर ने ही इन्हें भी संवारा। जिसका नतीजा आज दुनिया के सामने है।