एक्टर सांसद विनोद खन्ना बेशक दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी यादें लोगों के जेहन में अमर रहेंगी। ऐसी ही एक याद के बारे में बता रहे हैं, उनके चाहने वाले।
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विनोद खन्ना
- फोटो : SELF
विनोद खन्ना की मौत की खबर से पूरे गुरदासपुर में मायूसी छाई हुई है। उनके साथ बिताए लम्हों को याद करते हुए लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। उन्होंने गुरदासपुर को अपने बेटे की तरह माना। वर्ष 2009 में विनोद खन्ना के चुनाव प्रचार में जब उनके बड़े बेटे अक्षय खन्ना आए तो उन्होंने कहा था कि पापा जलेबी की तरह हैं, जिसे जो एक बार खा ले, वह ताउम्र नहीं भूलेगा।
विनोद खन्ना के एक चाहने वाले बताते हैं कि वर्ष 1998 में जब गुरदासपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए विनोद खन्ना का नाम फाइनल हुआ तो वह पहली बार यहां आए। उस समय लोगों में उनका क्रेज कितना था कि सैलाब उमड़ पड़ा। नामांकन के लिए वह जिला निवार्चन कार्यालय तक नहीं जा पा रहे थे। इस पर कार्यकर्ताओं ने नेहरू पार्क की पिछली दीवार तोड़कर रास्ता बनाया था।
हरियाणा के एक किसान सोमदत्त को जब सिल्वर स्क्रीन पर बतौर हीरो उतारने की कवायद शुरू हुई तो इसी फिल्म की बदौलत विनोद खन्ना को पहला ब्रेक मिला। ये किसान कोई और नहीं बल्कि अभिनेता संजय दत्त के चाचा सोमदत्त थे। सोमदत्त के साथ मूवी में काम करने का पहला ब्रेक तो मिला, लेकिन विनोद खन्ना को खलनायक का क्रूर किरदार ही नसीब हुआ था। किस्मत देखिए, सोम दत्त तो इस फिल्म में नहीं चले, लेकिन विनोद खन्ना की निकल पड़ी।
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विनोद खन्ना
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उल्लेखनीय है कि साढ़े के दशक के अंतिम साल में रिलीज हुई मन का मीत यमुनानगर के गांव मंढौली वासी किसान सोम दत्त को लांच करने के लिए उनके बड़े भाई सुनील दत्त ने बनाई थी। तब ना यह फिल्म चली और ना ही इस फिल्म के हीरो सोम दत्त सफल हुए, मगर इसके बाद फिल्म से एंट्री करने वाले विनोद खन्ना का सिक्का ऐेसा चला कि करीब 48 वर्ष के कैरियर में उन्होंने खलनायक से नायक का मुकाम हासिल किया।