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एमपी: स्मार्ट क्लास में पीछे पर पढ़ाई के नतीजों में आगे: भोपाल-इंदौर जैसे महानगरों को छोटे शहर सीधी ने पछाड़ा

Wed, 02 Sep 2026 06:29 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Wed, 02 Sep 2026 06:29 PM IST
सार

पीजीआई-डी के आंकड़ों में सरकारी स्कूलों की पढ़ाई को लेकर चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। सीधी जैसे छोटे जिले ने आउटकम में भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों को पीछे छोड़ दिया, जबकि डिजिटल लर्निंग में उसका स्कोर काफी कम है।

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MP: Lagging in smart classrooms but leading in academic results—small town Sidhi has outperformed major cities
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रदेश के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट और तकनीकी सुविधाओं पर जोर बढ़ रहा है, लेकिन स्कूलों की असली तस्वीर बच्चों के सीखने के नतीजों से सामने आ रही है। परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स फॉर डिस्ट्रिक्ट्स (पीजीआई-डी) के आंकड़े शिक्षा व्यवस्था के इसी विरोधाभास को सामने रखते हैं। सीधी जिला डिजिटल लर्निंग में महज 10 अंक हासिल करता है, जबकि उसका आउटकम स्कोर 194 अंक है। दूसरी ओर राजधानी भोपाल और आर्थिक राजधानी इंदौर में डिजिटल लर्निंग का स्कोर सीधी से करीब दोगुना है, लेकिन बच्चों के वास्तविक शैक्षणिक परिणामों का स्कोर सीधी से पीछे है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्कूल में स्मार्ट क्लास है या नहीं, कंप्यूटर हैं या नहीं और डिजिटल संसाधन कितने हैं। असली सवाल यह है कि इन संसाधनों का बच्चों की पढ़ाई पर कितना असर पड़ रहा है।
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 पीजीआई-डी के अनुसार पांच शीर्ष जिलों के आंकड़े: सीधी—333 अंक, उज्जैन—323 अंक, शाजापुर—318 अंक, दमोह—312 अंक, नरसिंहपुर—307 अंक। बड़े शहरों के आंकड़े: भोपाल—285 अंक, इंदौर—284 अंक, ग्वालियर—277 अंक, जबलपुर—267 अंक।

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सीखने पर फोकस जरूरी
रिपोर्ट के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि स्कूलों में संसाधन बढ़ाना जरूरी है, लेकिन केवल संसाधनों की उपलब्धता से शिक्षा की गुणवत्ता तय नहीं की जा सकती। यदि किसी जिले में डिजिटल सुविधाएं कम होने के बावजूद बच्चों के परिणाम बेहतर हैं, तो वहां की शिक्षण प्रक्रिया का अध्ययन दूसरे जिलों के लिए मॉडल बन सकता है। वहीं, ज्यादा डिजिटल संसाधन वाले जिलों में आउटकम अपेक्षाकृत कमजोर है तो यह भी देखने की जरूरत है कि उपलब्ध संसाधनों का कक्षा में कितना इस्तेमाल हो रहा है। 

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प्रदेश का टॉपर भी 60 फीसदी तक नहीं पहुंचा
सीधी का कुल स्कोर 333 अंक है। 600 में से यह 55.5 फीसदी होता है। यानी प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करने वाला जिला भी कुल उपलब्ध अंकों के 60 फीसदी के स्तर तक नहीं पहुंच पाया। पीजीआई-डी में स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता को छह प्रमुख हिस्सों में बांटकर आकलन किया गया है। इनमें सबसे ज्यादा 290 अंक आउटकम, 90 अंक इफेक्टिव क्लासरूम ट्रांजेक्शंस (ईसीटी), 51 अंक इंफ्रास्ट्रक्चर, फैसिलिटीज एंड स्टूडेंट एंटाइटलमेंट्स (आईएफ एंड एसई), 35 अंक स्कूल सेफ्टी एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन (एसएस एंड सीपी), 50 अंक डिजिटल लर्निंग (डीएल) और 84 अंक गवर्नेंस प्रोसेस (जीपी) के हैं। 

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डिजिटल सुविधा ज्यादा, नतीजे कम
आंकड़ों का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता और बच्चों के परिणामों के बीच सीधा संबंध नजर नहीं आता। सीधी को डिजिटल लर्निंग के लिए सिर्फ 10 अंक हैं, लेकिन आउटकम में 194 अंक मिले हैं। वहीं, भोपाल और इंदौर में डिजिटल लर्निंग का प्रदर्शन बेहतर होने के बावजूद आउटकम स्कोर सीधी से पीछे है। इससे सवाल उठता है कि क्या स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट और तकनीकी संसाधन ही सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए पर्याप्त हैं? या फिर बच्चों के सीखने में शिक्षक की भूमिका, कक्षा में नियमित पढ़ाई, शिक्षण पद्धति, बच्चों की उपस्थिति और स्कूल प्रबंधन जैसे कारक ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? 

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शहरों में बच्चों के सामने भटकाव बड़ी वजह : डॉ. अर्चना शुक्ला
राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त भोपाल की शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला ने कहा कि सरकारी स्कूलों में डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन केवल डिजिटल संसाधनों से बच्चों के लर्निंग आउटकम में सुधार संभव नहीं है। कई स्कूलों में वीडियो चलने जैसी तकनीकी दिक्कतें भी आती हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के परिणाम प्रभावित होने का एक कारण परीक्षा के पैटर्न और पढ़ाने व प्रश्न पूछने के तरीके में अंतर भी है। क्रिटिकल थिंकिंग और कॉन्सेप्चुअल अंडरस्टैंडिंग पर अधिक जोर देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शहरी और ग्रामीण बच्चों की परिस्थितियां अलग हैं। शहरों में बच्चों के सामने कई तरह के भटकाव हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना अपेक्षाकृत आसान है। भोपाल में कई सरकारी स्कूलों के बच्चे आर्थिक परिस्थितियों के कारण पढ़ाई के साथ परिवार के काम में भी मदद करते हैं। डॉ. शुक्ला ने बताया कि शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी लगातार काम हो रहा है। एआई और डिजिटल तकनीक को उन्होंने उपयोगी सहायक बताया, लेकिन इन पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचने की सलाह दी।

प्रभावी शिक्षण का तरीका बड़ा कारण
राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि नई शिक्षा नीति के तहत डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर बच्चों को रोचक तरीके से पढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कठिन अवधारणाओं से जुड़े क्यूआर कोड तैयार किए हैं। इन अवधारणाओं को वीडियो और टेक्स्ट के रूप में तैयार कर स्कूल की दीवारों पर चस्पा किया गया है। बच्चे मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन कर संबंधित विषय का वीडियो और पाठ्य सामग्री देख सकते हैं। बेहतर परिणाम के लिए केवल डिजिटल संसाधन ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की प्रभावी शिक्षण पद्धति, बच्चों की भागीदारी और अवधारणाओं की समझ भी महत्वपूर्ण है।

हमने संबंधित रिपोर्ट मांगी : प्रमुख सचिव
स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव संजय गोयल ने कहा कि हमने हर प्वाइंट के नंबर को लेकर रिपोर्ट मांगी हैं। ताकि यह देखा जा सके कि बड़े शहरों और छोटे शहरों में अंतर का क्या कारण हैं। साथ ही किन क्षेत्र में काम करने की जरुरत हैं। अभी हमारे द्वारा स्कूलों में पढ़ाई को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों की ट्रेनिंग के साथ ही बच्चों के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के लिए लगातार काम किया जा रहा हैं।

 
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