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UP Election 2022: कांग्रेस का पराभव, क्षत्रपों का उदय

Mon, 22 Nov 2021 03:11 PM IST
विक्रांत चतुर्वेदी अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ Published by: विक्रांत चतुर्वेदी Updated Mon, 22 Nov 2021 03:11 PM IST
सार

मंडल-कमंडल का जोर...फीकी पड़ी धर्मनिरपेक्षता की चमक
प्रदेश की राजनीति में साल 1989 वह पड़ाव है, जहां उसकी दशा और दिशा में अहम बदलाव हुए। इस कालखंड में जहां धर्मनिरपेक्षता की चमक फीकी पड़ी, वहीं मंडल-कमंडल की राजनीति परवान चढ़ी। जनता दल का उदय हुआ तो कांग्रेस के पराभव की बुनियाद पड़ी। मुलायम सिंह, कांशीराम और मायावती सियासी परिदृश्य पर उभरे। इसी दौर में सियासत में भगवा रंग गाढ़ा हुआ। राममंदिर आंदोलन के जरिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा ने जिस आक्रामक हिंदुत्व का सहारा लिया, उसके दूरगामी परिणाम हुए। कमोबेश दक्षिण भारत की तर्ज पर उत्तर में भी दो क्षेत्रीय दल उभरे।
 

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UP Election 2022: The year 1989 is the stage in the politics of the uttar pradesh, where important changes took place in its condition and direction
यूपी का रण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यह कालखंड कांग्रेस की विदाई, हिंदुत्व के पैरोकारों और पिछड़ों एवं अनुसूचित जाति के लोगों के अपने सरोकारों वाली सत्ता की खोज के लिए इतिहास में दर्ज है। यह वो कालखंड है जिसमें हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता की जोर आजमाइश शुरू हुई थी। इसी कालखंड में धर्मनिरपेक्षता की झंडाबरदार ताकतों की तरफ से राजनीतिक अछूत करार दिए गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लोगों को अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए अयोध्या आंदोलन जैसी योजना पर काम किया। पर, यह सब कैसे हुआ? इसके लिए वर्ष 1984 से 1990 के दौर में हुए परिवर्तनों से पहले की पृष्ठभूमि एवं राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालना जरूरी है। उस समय हिंदुत्व शब्द को मुंह से निकालने वाले को समाज से लेकर राजनीति तक हेय और हिकारत की नजर से देखा जाता था।

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जनसंघ और भाजपा को धर्मनिरपेक्षता का शत्रु बताया जाता था। संघ ने इस स्थिति को बदलने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू किए। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने घोषणा की कि, ‘जो लोग आज हिंदुत्व के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, वे देखेंगे एक दिन देश की राजनीति के केंद्र में यह होगा।’ आज जब अखिलेश यादव खुद को हिंदू बता रहे हैं। कांग्रेस के नेता मंदिर-मंदिर घूमते हैं और बसपा नेता सत्ता में आने पर भव्य राम मंदिर निर्माण की बात करते हैं तो 1984 से 1990 के कालखंड की प्रासंगिकता समझ में आ जाती है।
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मुलायम, कांशीराम और मायावती का उदय
हिंदुत्व के उभार के साथ इसी दौर में मुलायम, कांशीराम और मायावती जैसे राजनीतिक चेहरे उभरे, जिन्होंने प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य के बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई। बामसेफ के जरिये देशभर में घूम-घूम कर अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यकों, खासतौर से मुसलमानों को उनके वोट की ताकत समझा रहे कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी नाम से एक नया राजनीतिक दल गठित कर अनसूचित जातियों और अल्पसंख्यकों के वोट के जोड़ से सत्ता परिवर्तन की हुंकार भरी। उधर, चौधरी चरण सिंह की वृद्धावस्था के चलते उनके शिष्य मुलायम सिंह यादव सोशलिस्ट ताकतों को एकजुट कर लोकदल के जरिये राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका की तलाश में जुटे थे। मायावती भी इसी दौर में कांशीराम के साथ जुड़ीं और राजनीति में सक्रिय हुईं।

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बोफोर्स घोटाले ने बदले समीकरण

लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी बताते हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिन परिस्थितियों में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, उसमें उनका भले ही किसी ने खुला विरोध नहीं किया, लेकिन पार्टी के कुछ नेता इससे सहमत नहीं थे। इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र लोगों में शामिल रहे वीपी सिंह को राजीव गांधी ने अपनी कैबिनेट में वित्त जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया, लेकिन जल्द ही दोनों के बीच महत्वाकांक्षा के टकराव की खबरें सार्वजनिक होने लगीं। वीपी सिंह को वित्तमंत्री का पद गंवाना पड़ा। रक्षामंत्री के रूप में भी उनकी राजीव से नहीं निभी। पनडुब्बी, बोफोर्स तोप खरीद मामले में उनके और राजीव के बीच
तनातनी ज्यादा बढ़ गई।

तनातनी के बीच वीपी सिंह ने मंत्री पद व कांग्रेस को छोड़ दिया। उन्होंने पनडुब्बी और बोफोर्स तोप खरीद में घूस लिए जाने का आरोप लगाते हुए राजीव गांधी ही नहीं, बल्कि उनकी पूरी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने जनमोर्चा नाम का संगठन बनाया और बोफोर्स तोप घोटाले की जांच की मांग कर देशभर में घूमना शुरू कर दिया। उनकी इस मुहिम में एक समय राजीव गांधी के खास रहे अरुण नेहरू और शाहबानो प्रकरण पर पहले ही कांग्रेस छोड़ चुके मो. आरिफ खां भी शामिल थे। उत्तर प्रदेश में भी अमेठी राजघराने के संजय सिंह जैसे नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी।

अमिताभ का त्यागपत्र, वीपी का उभार

उस समय राजीव गांधी के मित्र सुपर स्टार अमिताभ बच्चन इलाहाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद थे। बोफोर्स तोप घोटाला के लेनदेन में अमिताभ बच्चन पर भी आरोप लगे तो उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। उनके त्यागपत्र से रिक्त स्थान को भरने के लिए 1988 में उपचुनाव हुआ जिसमें जनमोर्चा के संयोजक वीपी सिंह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते। समाजवादी नेता केके श्रीवास्तव बताते हैं कि वीपी सिंह की जीत के बाद बोफोर्स तोप और पनडुब्बी खरीद घोटाला पर कांग्रेस के विरुद्ध लामबंद विपक्षी दलों की कर्नाटक में बैठक हुई, जिसमें जनता दल का गठन हुआ। वीपी सिंह संयोजक बने और चौ. अजित सिंह महासचिव।

गैर कांग्रेसियों का भरोसा बढ़ा
बोफोर्स तोप खरीद में घोटाला और हिंदुत्व के शोर के बीच नवंबर 1989 में मतदान हुए। चुनाव नतीजे आए तो जनता दल और उसके साथ के दल कांग्रेस से आगे थे। आपातकाल के बाद पहली बार जनता दल के रूप में देश व प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकारों ने सत्ता संभाली। इस चुनाव ने देश व प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदलते हुए सियासत की दिशा और दशा भी बदल दी। जनसंघ के पुनर्जन्म से बनी भाजपा को 57 सीटों पर जीत दिलाकर उसे हिंदुत्व के सहारे सिंहासन का सफर सफलतापूर्वक पूरा करने का रास्ता दिखा दिया। बसपा भी 13 सीटें जीतकर अनुसूचित जाति के लोगों को राजनीति में उनके वोट की ताकत का एहसास कराने में सफल रही।

वोटों के गणित में अजित से जीते मुलायम, बने सीएम 

मुलायम-चंद्रशेखर आए साथ
जनता दल 208 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरा। भाजपा ने 94 सीटें पाने वाली कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए मुलायम का साथ दिया। जनता दल में उत्तर प्रदेश के एक-दूसरे के विरोधी अजित और मुलायम भी थे। दोनों की नजर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने प्रदेश में जनता दल की सरकार बनने पर चौ. अजित सिंह को मुख्यमंत्री
बनाने का वादा  किया था। पर, मुलायम अड़ गए।

मुलायम को वीपी सिंह उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन वह नहीं माने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ लंबे समय तक काम कर चुके निर्मल सिंह बताते हैं कि विधायकों के मतदान से मुख्यमंत्री तय करने का फैसला किया गया। अजित खेमे के 11 विधायक टूट गए। अंतत: अजित सिंह और मुलायम के शक्ति संघर्ष में मुलायम का फायदा हुआ और वह मुख्यमंत्री बन गए। नतीजा हुआ कि सरकार बनने के साथ ही जनता दल में फिर खटपट शुरू हो गई। इसमें मुलायम सिंह और वीपी सिंह का टकराव भी एक बड़ा मोड़ रहा।

लड़ाई भाजपा, सपा और बसपा में सिमटी

संघ परिवार की नजर अपने लक्ष्य पर थी। राममंदिर पर उसे जिस तरह समर्थन मिल रहा था, उससे उसने भी समझ लिया कि राजनीति पर भगवा रंग चढ़ाने का इससे अच्छा मौका नहीं आएगा। संघ को इस पूरे आंदोलन का लाभ आखिरकार भाजपा को ही दिलाना था। बिहार में लालू यादव ने जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कराया, यूपी में मुलायम सिंह ने जिस तरह कारसेवा रोकने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कराने के साथ कारसेवकों पर गोली चलवाई, उसने हिंदुओं को भाजपा
से जोड़ने में और मदद कर दी। 

प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं, इससे मुलायम को भी लाभ हुआ। वे मुसलमानों को अपने पाले में खींचने और जातीय गणित के चलते अपने सजातीय वोट जोड़ने में सफल रहे। पर, 1989-90 के इस कालखंड ने ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार कर दी, जिसमें प्रदेश में कांग्रेस के लिए कोई जगह ही नहीं बची। यहां की सियासी लड़ाई भाजपा, सपा और बसपा के बीच सिमट गई। वीपी सिंह भी कहीं के नहीं रहे। मंडल कमीशन के बाद राजनीति में वह प्रभावी और लंबी पारी नहीं खेल पाए। भाजपा के समर्थन वापस लेने के कारण केंद्र में उनकी सरकार गिर गई। जनता दल टूटा। मुलायम, वीपी सिंह का साथ छोड़कर चंद्रशेखर के साथ हो गए। केंद्र में चंद्रेशखर ने कांग्रेस के समर्थन और प्रदेश में मुलायम ने भी उसी कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाई जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर 1989 में सत्ता में आए थे। पर, कुछ महीने बाद कांग्रेस ने पहले चंद्रशेखर की और इसके एक महीने बाद मुलायम की सरकार से समर्थन वापस ले लिए और सरकारें गिर गईं।

चुनावी किस्से...और गच्चा खा गए ‘अध्यक्ष जी’

1989 में हुए लोकसभा चुनाव में वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल को कांग्रेस के 191 सीटों के मुकाबले 143 सीटें ही मिलीं। जनता दल के नेतृत्व में तेलगुदेशम, असम गण परिषद, द्रमुक को साथ लेकर राष्ट्रीय मोर्चा बना। भाजपा व दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां भी साथ आ गईं और राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। वीपी सिंह स्वयं को प्रधानमंत्री मानकर चल रहे थे लेकिन चंद्रशेखर जिन्हें लोग ‘अध्यक्ष जी’ के नाम से भी पुकारते थे, वे उनको किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री नहीं देखना चाहते थे। समाजवादी नेता निर्मल सिंह बताते हैं कि अरुण नेहरू, बीजू पटनायक और उस समय दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार जिन्हें वीपी सिंह ने अपनी सरकार में ब्रिटेन का उच्चायुक्त बनाया, ने जनता दल न टूटने देने की दुहाई देकर ‘अध्यक्ष जी’ से बातचीत की। ‘अध्यक्ष जी’ ने कहा कि वे वीपी के अलावा किसी को भी प्रधानमंत्री स्वीकार करने को तैयार हैं। इन लोगों ने देवीलाल का नाम सुझाया। ‘अध्यक्ष जी’ ने स्वीकृति दे दी। पर, इन लोगों ने तो देवीलाल को प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेश में अंग्रेजी बोलने जैसी कुछ अन्य बातें समझाकर कुछ और ही योजना बना रखी थी। बैठक में देवीलाल का नाम प्रस्तावित हुआ। पर, देवीलाल ने वीपी का नाम प्रस्तावित कर दिया। चौधरी अजित सिंह ने इसका अनुमोदन कर दिया। देवीलाल ने उप प्रधानमंत्री पद स्वीकार कर लिया। देवीलाल के इस तरह पलटी मारने से क्षुब्ध ‘अध्यक्ष जी’ उठे और बाहर निकल गए।

देवी के रथ ने दिया मुलायम को वरदान
चौधरी देवीलाल का ‘क्रांति रथ’ अपने नाम की ही तरह बेहद क्रांतिकारी साबित हुआ। इसी रथ पर सवार हो मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। बात उन दिनों की है जब वीपी सिंह जनमोर्चा बनाकर बोफोर्स घोटाले के खिलाफ  पूरे देश में घूम रहे थे। वहीं, दूसरी ओर चौधरी देवीलाल थे जो कांग्रेस के ही हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने एक मेटाडोर पर रथ बनवाया था, जिसे नाम दिया था ‘क्रांति रथ’। देवीलाल ने वीपी सिंह का साथ देने की घोषणा की और ‘क्रांति रथ’ से हरियाणा के बाहर भी कांग्रेस के खिलाफ जनजागरण का एलान कर दिया। उन्होंने यात्रा का समापन कानपुर के फूलबाग में करने का फैसला किया था। पर, जब कानपुर पहुंचे तो घोषणा कर दी कि उनकी ‘क्रांति रथ यात्रा’ का भले ही समापन हो रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह चलती रहेगी। अब इस यात्रा को मुलायम सिंह चलाएंगे। मुलायम ने इस रथ के जरिये प्रदेश के कोने-कोने का भ्रमण कियाऔर कांग्रेस के घोटालों व भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए जनता से परिवर्तन का आह्वान किया।’

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