लखनऊ। लखनऊ है तो महज गुंबद-ओ-मीनार नहीं, सिर्फ एक शहर नहीं कूचा-ए-बाजार नहीं, इसके आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं, इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं...। विख्यात इतिहासकार पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीण की इन कालजयी पंक्तियों को जब लोकगायिका कुसुम वर्मा ने सुनाया तो तालियों का उत्सव हो गया। मौका था डॉ. योगेश प्रवीण की 87वीं जयंती पर गोमतीनगर के शीरोज हैंगआउट में आयोजित कार्यक्रम का। शहर के साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि लखनऊ के इतिहास को पूरी दुनिया के सामने लाने में योगेश प्रवीन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनके लिखे नवाबों के किस्से, शेर-ओ-शायरी, गीत और अवध का इतिहास आज भी यहां के लोगों की जुबान पर हैं। जीजीआईसी की प्रधानाचार्य और लोकगायिका कुसुम वर्मा के संचालन में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ला, विशिष्ट अतिथि पूर्व जस्टिस राघवेंद्र कुमार और योगेश प्रवीन के भाई इंजीनियर कामेश श्रीवास्तव, प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी ने डाॅ. योगेश प्रवीन के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया। इस दौरान वक्ताओं ने उनके साथ बिताए संस्मरण सुनाए। अध्यक्षता एडवोकेट के. सरन ने की। राशि श्रीवास्तव, नवनीत भसीन, इंदिरा श्रीवास्तव ने गीत प्रस्तुत किए। श्रद्धांजलि देने वालों में अनूप श्रीवास्तव, आलोक सरन, रेखा बोरा, डॉ. शशिकांत द्विवेदी, ओम कुमारी सिंह, डॉ. पूनम श्रीवास्तव, प्रेम कुमार आनंद और एडवोकेट मनोज लाल आदि मौजूद रहे।