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Lucknow News: महिलाओं की आजादी का गवाह जनाना पार्क हुआ बदहाल
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बदहाल जनाना पार्क।
लखनऊ। अमीनाबाद स्थित जनाना पार्क जहां पर्दानशीं महिलाओं ने जंगे आजादी का बिगुल फूंका, आज बदहाली और अतिक्रमण से जूझ रहा है। देश का पहला महिला पार्क अब कूड़ाघर और पेशाबघर में तब्दील हो गया है। बाउंड्री टूटी है और इसके वजूद पर खतरा मंडरा रहा है।
जनाना पार्क महात्मा गांधी की इच्छा पर अस्तित्व में आया था। बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत के अनुसार, उनकी सास व संस्था की संस्थापक बेगम सुलताना हयात की सक्रियता से प्रेरित होकर गांधी ने पर्दानशीं महिलाओं के लिए अलग पार्क की परिकल्पना की थी। इसी क्रम में लखनऊ के रईस सर गंगा प्रसाद वर्मा ने 1914 में अमीनाबाद में करीब तीन एकड़ जमीन 15 हजार रुपये में खरीदकर बज्म-ए-ख्वातीन को दी, जहां जनाना पार्क बना।
यहां आठ वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों का प्रवेश वर्जित था और स्टाफ में महिलाएं ही थीं। 25 जुलाई 1934 को महात्मा गांधी ने यहीं महिलाओं की विशाल सभा को संबोधित कर उन्हें जंगे आजादी का अग्रदूत बताया। इस पार्क में सरोजनी नायडू, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद और इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां भी आईं।
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1962 के युद्ध में भी निभाई भूमिका
भारत-चीन युद्ध के दौरान 1962 में बुर्कानशीं महिलाओं ने जनाना पार्क से मोतीमहल लॉन स्थित कांग्रेस मुख्यालय तक मार्च निकालकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की।
बज्म-ए-ख्वातीन का केंद्र रहा पार्क
स्थापना से ही जनाना पार्क और बज्म-ए-ख्वातीन एक-दूसरे के पर्याय रहे। हर माह की 15 तारीख को यहां महिलाओं के कार्यक्रम होते हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और कानूनी अधिकारों पर जागरूकता दी जाती है।
तीन एकड़ से सिमटता पार्क
बेगम शहनाज के अनुसार, 1945 में पार्क की देखरेख नगर निगम को सौंपी गई, लेकिन लापरवाही से पार्क सिमटता गया। फिर भी हर माह महिलाएं गंदगी के बीच कार्यक्रम करने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब है, जब महिलाओं के अनुरोध पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे राष्ट्रीय पार्क सूची में शामिल करने का प्रस्ताव बनाने को कहा था।
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जनाना पार्क महात्मा गांधी की इच्छा पर अस्तित्व में आया था। बज्म-ए-ख्वातीन की अध्यक्ष बेगम शहनाज सिदरत के अनुसार, उनकी सास व संस्था की संस्थापक बेगम सुलताना हयात की सक्रियता से प्रेरित होकर गांधी ने पर्दानशीं महिलाओं के लिए अलग पार्क की परिकल्पना की थी। इसी क्रम में लखनऊ के रईस सर गंगा प्रसाद वर्मा ने 1914 में अमीनाबाद में करीब तीन एकड़ जमीन 15 हजार रुपये में खरीदकर बज्म-ए-ख्वातीन को दी, जहां जनाना पार्क बना।
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यहां आठ वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों का प्रवेश वर्जित था और स्टाफ में महिलाएं ही थीं। 25 जुलाई 1934 को महात्मा गांधी ने यहीं महिलाओं की विशाल सभा को संबोधित कर उन्हें जंगे आजादी का अग्रदूत बताया। इस पार्क में सरोजनी नायडू, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद और इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां भी आईं।
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1962 के युद्ध में भी निभाई भूमिका
भारत-चीन युद्ध के दौरान 1962 में बुर्कानशीं महिलाओं ने जनाना पार्क से मोतीमहल लॉन स्थित कांग्रेस मुख्यालय तक मार्च निकालकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की।
बज्म-ए-ख्वातीन का केंद्र रहा पार्क
स्थापना से ही जनाना पार्क और बज्म-ए-ख्वातीन एक-दूसरे के पर्याय रहे। हर माह की 15 तारीख को यहां महिलाओं के कार्यक्रम होते हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और कानूनी अधिकारों पर जागरूकता दी जाती है।
तीन एकड़ से सिमटता पार्क
बेगम शहनाज के अनुसार, 1945 में पार्क की देखरेख नगर निगम को सौंपी गई, लेकिन लापरवाही से पार्क सिमटता गया। फिर भी हर माह महिलाएं गंदगी के बीच कार्यक्रम करने को मजबूर हैं। यह स्थिति तब है, जब महिलाओं के अनुरोध पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे राष्ट्रीय पार्क सूची में शामिल करने का प्रस्ताव बनाने को कहा था।

बदहाल जनाना पार्क।

बदहाल जनाना पार्क।

बदहाल जनाना पार्क।