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Lucknow News: घड़ियालों ने दी स्वस्थ नदियों की गवाही
Mon, 29 Jun 2026 12:02 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Mon, 29 Jun 2026 12:02 AM IST
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कुकरैल में तेजी से बढ़ रही है घड़ियालों की संख्या। - संवाद
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की गंगा, घाघरा, चंबल, यमुना, केन और तमसा जैसी प्रमुख नदियों में घड़ियालों की बढ़ती मौजूदगी इन जलधाराओं के स्वस्थ होते पारिस्थितिकी तंत्र की कहानी बयां कर रही है। साल-दर-साल प्राकृतिक आवास में बढ़ रही इनकी संख्या इस बात का संकेत है कि नदियों का पर्यावरण और जलीय इकोसिस्टम बेहतर हो रहा है।
कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश की प्रमुख नदियों में हर वर्ष औसतन 130 से 140 घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा रहा है। संतोषजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश घड़ियाल प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित और जीवित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इनकी बेहतर उत्तरजीविता नदियों के जलस्तर और पारिस्थितिकी तंत्र में लगातार हो रहे सुधार का संकेत है।
लुप्तप्राय परियोजना के वन संरक्षक संजय कुमार बिश्वाल ने बताया कि वर्ष 1970 के दशक में देश में घड़ियालों की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। उस समय हुए देशव्यापी सर्वेक्षण में केवल 250 से 300 घड़ियाल ही जीवित मिले थे। इसके बाद संरक्षण प्रयासों को गति दी गई। वर्तमान में कुकरैल केंद्र में 466 घड़ियाल हैं और यहां हर वर्ष औसतन 140 से 160 नए घड़ियालों की वृद्धि दर्ज की जा रही है।
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नमामि गंगे के तहत 500 अंडों की हैचिंग का लक्ष्य
नमामि गंगे परियोजना के तहत इस वर्ष विभिन्न प्राकृतिक आवासों से 500 अंडे सुरक्षित लाकर कुकरैल पुनर्वास केंद्र में कृत्रिम रूप से हैच कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य गंगा और उसकी सहायक नदियों में घड़ियालों की आबादी को और बढ़ाना है।
नदी की सेहत का पैमाना हैं घड़ियाल
नदियों में घड़ियालों की बढ़ती संख्या सीधे तौर पर पानी की शुद्धता को दर्शाती है। घड़ियाल बेहद संवेदनशील जीव हैं, जो केवल साफ, प्रदूषण मुक्त और निरंतर बहते हुए पानी में ही जीवित रह सकते हैं। इनकी आबादी बढ़ने से न केवल नदी का प्राकृतिक बहाव अनुकूल रहता है, बल्कि जलीय खाद्य श्रृंखला भी संतुलित और मजबूत होती है।
- अनामिका सिंह, रेंजर, कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र
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कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश की प्रमुख नदियों में हर वर्ष औसतन 130 से 140 घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा रहा है। संतोषजनक बात यह है कि इनमें से अधिकांश घड़ियाल प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित और जीवित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इनकी बेहतर उत्तरजीविता नदियों के जलस्तर और पारिस्थितिकी तंत्र में लगातार हो रहे सुधार का संकेत है।
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लुप्तप्राय परियोजना के वन संरक्षक संजय कुमार बिश्वाल ने बताया कि वर्ष 1970 के दशक में देश में घड़ियालों की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। उस समय हुए देशव्यापी सर्वेक्षण में केवल 250 से 300 घड़ियाल ही जीवित मिले थे। इसके बाद संरक्षण प्रयासों को गति दी गई। वर्तमान में कुकरैल केंद्र में 466 घड़ियाल हैं और यहां हर वर्ष औसतन 140 से 160 नए घड़ियालों की वृद्धि दर्ज की जा रही है।
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नमामि गंगे के तहत 500 अंडों की हैचिंग का लक्ष्य
नमामि गंगे परियोजना के तहत इस वर्ष विभिन्न प्राकृतिक आवासों से 500 अंडे सुरक्षित लाकर कुकरैल पुनर्वास केंद्र में कृत्रिम रूप से हैच कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य गंगा और उसकी सहायक नदियों में घड़ियालों की आबादी को और बढ़ाना है।
नदी की सेहत का पैमाना हैं घड़ियाल
नदियों में घड़ियालों की बढ़ती संख्या सीधे तौर पर पानी की शुद्धता को दर्शाती है। घड़ियाल बेहद संवेदनशील जीव हैं, जो केवल साफ, प्रदूषण मुक्त और निरंतर बहते हुए पानी में ही जीवित रह सकते हैं। इनकी आबादी बढ़ने से न केवल नदी का प्राकृतिक बहाव अनुकूल रहता है, बल्कि जलीय खाद्य श्रृंखला भी संतुलित और मजबूत होती है।
- अनामिका सिंह, रेंजर, कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र