लखनऊ। ऑल इंडिया कैफी आजमी अकादमी और जनवादी लेखक संघ की ओर से उर्दू में साझा संस्कृति विषय पर गोष्ठी का आयोजन शनिवार को कैफी आजमी अकादमी में किया गया। इस अवसर पर सगीर अफराहीम की किताब ‘प्रेमचंद : एक नकीब’ के द्वितीय संस्करण और खालिद अशरफ की किताब ‘परेखाना : बेगमात-ए-अवध के खुतूत’ का विमोचन किया गया। वक्ताओं ने उर्दू को साझा संस्कृति का अभिन्न अंग बताते हुए इसके संरक्षण पर जोर दिया।
इस अवसर पर अली अहमद फातमी ने कहा कि हर धर्म को भाषा की जरूरत होती है लेकिन किसी भाषा को धर्म की जरूरत नहीं होती। बंटवारे के बाद उर्दू को मुस्लिमों से जोड़ा गया, जबकि नजीर ने हिंदू देवी-देवताओं और त्योहारों पर भी कई नजमें लिखी थीं। फातमी ने गालिब, इकबाल और हसरत मोहानी का हवाला देते हुए उर्दू को भारतीय संस्कृति की गहराई का वाहक बताया। खालिद अशरफ ने भाषा विज्ञान के अनुसार दोनों को एक ही भाषा बताया, जिसमें लगभग सत्तर फीसदी शब्द पंजाबी, ब्रज, अवधी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से हैं। उन्होंने देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बचाने के लिए दोनों भाषाओं को फलने-फूलने देने की बात कही। राजीव प्रकाश साहिर, सगीर अफराहीम, झारखंड से आए अली इमाम आदि ने संबोधित किया। संचालन सलमान खयाल ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आभा खरे ने किया।