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डेपुटेशन के बाद तबादले को नहीं दे सकते चुनौती
ब्यूरो/अमर उजाला, जम्मू
Updated Mon, 31 Aug 2015 12:20 PM IST
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हाईकोर्ट के जस्टिस ताशी राबस्तन ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) एक अनुबंधात्मक तदर्थ व्यवस्था है। डेपुटेशन पर भेजे जाने वाले मुलाजिम को ऐसा अधिकार प्रदान नहीं है कि वह डेपुटेशन का समय पूरा करे।
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पवन नेहरू और अन्य द्वारा राहत और पुनर्वास विभाग के सचिव की ओर से जारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को उनके मुख्य विभाग (पैरेंट डिपार्टमेंट) से तत्काल प्रभाव से स्थानांतरित कर दिया गया।
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याचिका के अनुसार चारों मुलाजिमों को चार अप्रैल 2014 को जम्मू राजस्व विभाग में जोनल अफसर के रूप में नियुक्त किया गया। राजस्व विभाग में पुनर्गठन कर नए जोन बनाए गए, ताकि कश्मीरी विस्थापितों को राहत एवं पुनर्वास का लाभ प्रभावशाली ढंग से दिया जा सके।
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याचिकाकर्ताओं को राहत एवं पुनर्वास विभाग में जोनल अफसर या कैंप कमांडेंट के रूप में समायोजित किया गया। याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह है कि नियुक्ति के छह माह बाद ही 10 अगस्त 2015 को सचिव ने नया आदेश जारी करते हुए उन्हें समय से पहले ही फिर पैरेंट डिपार्टमेंट में भेज दिया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि स्थानांतरण का मतलब होता है कि पैरेंट डिपार्टमेंट के एक सेक्शन या विंग से दूसरे में भेजना है। ‘प्रतिनियुक्ति पर स्थानांतरण’ का मतलब पैरेंट डिपार्टमेंट से बाहर सर्विस या उसी पद पर एक कैडर से दूसरे में भेजना होता है।
वर्तमान केस में याचिकाकर्ताओं को पैरेंट डिपार्टमेंट में ही स्थानांतरित नहीं किया गया, बल्कि उन्हें अन्य विभाग में डेपुटेशन पर भेजा गया। डेपुटेशन आदेश में यह नहीं लिखा गया कि उन्हें किसी खास अवधि के लिए भेजा गया है।
यदि आदेश में अवधि का जिक्र नहीं है तो संबंधित अथारिटी को अधिकार है कि वह उन्हें प्रशासनिक जरूरत के अनुसार पैरेंट विभाग में वापस भेज सकती है। जो समय से पहले भी किया जा सकता है। इसलिए याचिकाकर्ताओं को यह अधिकार नहीं है कि वह राहत व पुनर्वास विभाग में ही तैनात रह सकें। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी।