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सरकार वित्तीय दायित्वों से नहीं मुकर सकती, धन की कमी का बहाना नहीं चलेगा : हाईकोर्ट

Tue, 30 Sep 2025 02:37 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू Updated Tue, 30 Sep 2025 02:37 AM IST
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The government cannot shirk its financial obligations; the excuse of lack of funds will not work: High Court
जम्मू। जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि सरकार अपने वित्तीय दायित्वों से नहीं बच सकती। काम पूरा हो जाने के बाद धन की कमी या प्रशासनिक मंजूरी जैसी बातें नहीं उठाई जा सकतीं। कोर्ट ने इस मामले में आदेश दिया कि ठेकेदार को वर्ष 2017 से लंबित 97.5 लाख रुपये और छह फीसदी ब्याज चार हफ्ते के भीतर अदा की जाए।
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मामला शहर के पंजीकृत ठेकेदार शाम सिंह जम्वाल से जुड़ा है। उनकी फर्म को साल 2015 में शहर के डेरा कैंप से निकोवाल साई तक सड़क पर कारपेट बिछाने का काम मिला। काम की शुरुआती लागत 50 लाख रुपये थी जो बाद में बढ़कर 2.47 करोड़ रुपये हो गई। ठेकेदार ने काम समय पर पूरा किया और विभाग ने अंतिम बिल भी प्रमाणित कर दिया। इसके बावजूद करीब 97.5 लाख रुपये का भुगतान सरकार ने धन की कमी का हवाला देकर रोक दिया, जिसके चलते ठेकेदार को अदालत जाना पड़ा।
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मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगाल ने कहा कि जब सरकार खुद बकाया मान चुकी है तो फिर भुगतान टालने का कोई औचित्य नहीं। इस मामले में ठेकेदार की नहीं बल्कि शासन की गलती है। अदालत ने दो टूक कहा कि शासन की गरिमा केवल नियम बनाने में नहीं, बल्कि समय पर दायित्व निभाने में है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बकाया भुगतान रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका) और अनुच्छेद 300ए (संपत्ति के अधिकार) का उल्लंघन है। ठेकेदार की मेहनत की कमाई रोकना उसकी संपत्ति छीनने जैसा है और यह न्यायसंगत नहीं।
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60 दिन के भीतर भुगतान अनिवार्य हो, रोके जाने पर लगेगा जुर्माना

हाईकोर्ट ने आगे के लिए भी स्पष्ट नियम तय किए। कहा कि काम पूरा होने के बाद वित्तीय तंगी का बहाना देकर भुगतान नहीं रोका जाएगा। यदि भुगतान में देर होती है तो बैंक दर के अनुसार ब्याज देना होगा और यह ब्याज सीधे जिम्मेदार अफसरों की तनख्वाह से वसूला जाएगा। मुख्य सचिव को आदेश दिया गया है कि एक ऐसी प्रक्रिया बनाई जाए जिससे अंतिम बिल जमा होने के साठ दिन के भीतर भुगतान अनिवार्य रूप से हो। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि जानबूझकर भुगतान रोके जाने पर विभाग पर अतिरिक्त हर्जाना भी लगाया जा सकता है।
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