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आतंकी फंडिंग मामला: आतंकी यासीन मलिक को मौत की सजा पर 14 फरवरी को होगी सुनवाई

Wed, 06 Dec 2023 12:23 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू/नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू/नई दिल्ली Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Wed, 06 Dec 2023 12:23 PM IST
सार

दोषी यासीन मलिक के अपना अपराध स्वीकार करने पर ट्रायल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और शलिंदर कौर की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान मलिक की ओर से कोई भी पेश नहीं हुआ। अदालत ने सुनवाई 14 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी।

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Terror funding case: Hearing on death sentence of terrorist Yasin Malik to be held on February 14
Yasin Malik

विस्तार

 हाईकोर्ट ने आतंकी फंडिंग मामले में कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक के लिए मौत की सजा की मांग करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की याचिका पर सुनवाई 14 फरवरी के लिए सूचीबद्ध की है। अदालत ने तिहाड़ जेल अधीक्षक को मलिक को वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिये पेश करने का निर्देश दिया है।

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दोषी यासीन मलिक के अपना अपराध स्वीकार करने पर ट्रायल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और शलिंदर कौर की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख मलिक की ओर से कोई भी पेश नहीं हुआ। अदालत ने सुनवाई 14 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी।
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29 मई को, हाईकोर्ट ने आतंकी फंडिंग मामले में मौत की सजा की मांग करने वाली एनआईए की याचिका पर मलिक को नोटिस जारी किया था और अगली तारीख पर उसे पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद, जेल अधिकारियों ने एक आवेदन दाखिल कर उसे वर्चुअल माध्यम से पेश करने का अनुरोध किया था, जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया था।
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निचली अदालत ने 24 मई, 2022 को मलिक को कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और आईपीसी के तहत विभिन्न अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मलिक ने आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए सहित अन्य आरोपों में अपना दोष स्वीकार कर लिया था।

सजा के खिलाफ अपील करते हुए, एनआईए ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी आतंकवादी को केवल इसलिए आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और मुकदमा नहीं चलाने का विकल्प चुना है।

मौत की सजा की मांग करते हुए एनआईए ने कहा है कि अगर ऐसे खूंखार आतंकवादियों को सिर्फ इसलिए मौत की सजा नहीं दी जाती, क्योंकि उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो सजा नीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। ऐसे में आतंकवादियों के पास मौत की सजा से बचने का एक रास्ता बच जाएगा।

एनआईए ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा आतंकियों के अपराध के अनुरूप नहीं है। खासकर तब, जब देश और सैनिकों के परिवारों को जान का नुकसान हुआ है और ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष है कि मलिक के अपराध दुर्लभतम में से दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आते हैं। एजेंसी ने इस बात पर जोर दिया है कि यह उचित संदेह से परे साबित हो चुका है कि मलिक ने घाटी में आतंकवादी गतिविधियों का नेतृत्व किया और खूंखार विदेशी आतंकी संगठनों की मदद से घाटी में सशस्त्र विद्रोह की साजिश रच रहा था।

ऐसे खूंखार आतंकी को मृत्युदंड न देना न्याय का गर्भपात होगा

एजेंसी ने कहा कि ऐसे खूंखार आतंकवादी को मृत्युदंड न देने से न्याय का गर्भपात हो जाएगा। क्योंकि, आतंकवाद का एक कृत्य समाज के खिलाफ ही अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के खिलाफ अपराध है। दूसरे शब्दों में यह बाहरी आक्रमण, युद्ध का कृत्य और राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान है।

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