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Jammu News: ईश्वर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा हरि कथा का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
राजोरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के तत्वाधान में पंचायत घर दलहौडी में तीन दिवसीय श्री हरि कथा के दौरान श्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी ज्योत्सना भारती ने भक्त ध्रुव प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब ध्रुव पिता राजा उत्तानपात द्वारा उपेक्षा का शिकार हुआ, तब ध्रुव की माता सुनीति ने ध्रुव को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया और ध्रुव ईश्वर प्राप्ति के लिए वनों की तरफ गमन करता है। जहां उसकी भेंट संत नारद मुनि से होती है और संत नारद मुनि ध्रुव को बताते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक है। वह प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान है। इसलिए इसलिए अंतर जगत में ही ईश्वर दर्शनीय है और उसकी प्राप्ति होती है।
नारद मुनि ध्रुव को ब्रह्म ज्ञान में दीक्षित करते हैं और उसका दिव्य नेत्र खोलकर उसे प्रभु के दिव्य अलौकिक एवं सनातन रूप के दर्शन अंतर जगत में ही करा देते है। उसके उपरांत ध्रुव नारद मुनि की आज्ञा अनुसार अखंड ध्यान साधना करता है और अंतत: भगवान श्री हरि ध्रुव को ध्रुव को अपनी गोद में बिठाते हैं तथा उसे मृत्यु लोक और परलोक दोनों के ही सुख का वरदान देते हैं। कथा का सारांश बताते हुए साध्वी ने कहा कि ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहना ही बुद्धिमानी है और जीवन में ईश्वर रूपी लक्ष्य को प्राप्त करना ही जीवन की सफलता कहा गया है। कथा का समापन श्री आरती के साथ किया गया। उसके उपरांत लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
राजोरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के तत्वाधान में पंचायत घर दलहौडी में तीन दिवसीय श्री हरि कथा के दौरान श्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी ज्योत्सना भारती ने भक्त ध्रुव प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब ध्रुव पिता राजा उत्तानपात द्वारा उपेक्षा का शिकार हुआ, तब ध्रुव की माता सुनीति ने ध्रुव को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया और ध्रुव ईश्वर प्राप्ति के लिए वनों की तरफ गमन करता है। जहां उसकी भेंट संत नारद मुनि से होती है और संत नारद मुनि ध्रुव को बताते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक है। वह प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान है। इसलिए इसलिए अंतर जगत में ही ईश्वर दर्शनीय है और उसकी प्राप्ति होती है।
नारद मुनि ध्रुव को ब्रह्म ज्ञान में दीक्षित करते हैं और उसका दिव्य नेत्र खोलकर उसे प्रभु के दिव्य अलौकिक एवं सनातन रूप के दर्शन अंतर जगत में ही करा देते है। उसके उपरांत ध्रुव नारद मुनि की आज्ञा अनुसार अखंड ध्यान साधना करता है और अंतत: भगवान श्री हरि ध्रुव को ध्रुव को अपनी गोद में बिठाते हैं तथा उसे मृत्यु लोक और परलोक दोनों के ही सुख का वरदान देते हैं। कथा का सारांश बताते हुए साध्वी ने कहा कि ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहना ही बुद्धिमानी है और जीवन में ईश्वर रूपी लक्ष्य को प्राप्त करना ही जीवन की सफलता कहा गया है। कथा का समापन श्री आरती के साथ किया गया। उसके उपरांत लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।
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