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जानिए नवरात्र से जुड़ीं वैज्ञानिक महत्व की खास बातें

Wed, 24 Sep 2014 12:04 PM IST
Updated Wed, 24 Sep 2014 12:04 PM IST
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scientific importance of navratri

नवरात्र सामान्य तौर पर दो ऋतुओं का मिलन काल है। सर्दी और गर्मी की ऋतुएं जब मिलती हैं तो यह अवसर आता है। क्षितिज में जब सुबह और शाम दोनों मिलते हैं, सूर्य का उदय हो रहा हो या अस्त, उस संधि को संध्या का समय कहते हैं।

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सभी धर्मों के अनुयायी सुबह शाम ईश्वर का स्मरण करते हैं। भारतीय धर्म पंरपरा में दोनों संध्याओं के मिलन की तरह दोनों ऋतुएं मिलती हैं, तब भी साधना उपासना का क्रम और विधान अपनाया जाता है। नवरात्र दो माने गए हैं।
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छह-छह महीने के अंतर से बदलने वाली दो ऋतुओं के समय सर्द गर्म मौसम का मिजाज बदलता है और सूक्ष्मजगत में आध्यात्मिक तंरगों का प्रवाह भी नई दिशा और ऊर्जा की गति बदलती है।
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क्यों दो बार मनाया जाता है नवरात्र

scientific importance of navratri

वैसे वर्षा शरद, शिशिर, हेमंत, वसंत, ग्रीष्म यह छह ऋतुएं हैं, लेकिन दो ही ऋतुएं खास मानी गई हैं सर्दी एवं गर्मी।

वर्षा तो दोनों ही ऋतुओं में होती है। गर्मियों में सावन-भादो में बादल बरसते हैं तो सर्दियों में पौष और माघ में। सर्दी जब आने को होती है और गर्मी भाग रही होती है तो वह आश्विन के नवरात्र होते हैं।

सर्दी के जाने तथा गर्मी शुरु होने के दिनों में आती है। चैत्र की या वासंती नवरात्र कहलाती है, दो प्रधान ऋतुओं का मिलन काल इस तरह अतिमहत्वपूर्ण है व उसमें भी नौ दिनों की यह विशिष्ट अवधि और भी अधिक है।

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