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इनकी तीन पीढ़ियां खप गईं, लेकिन नहीं मिला हक...

Tue, 08 Dec 2015 04:19 PM IST
Updated Tue, 08 Dec 2015 04:19 PM IST
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problem are not finish yet of nepali people who lives in jammu kashmir

रश्मि शर्मा के पूर्वज पास के ही बिश्नाह में आजादी के पहले से रह रहे हैं, लेकिन उनके बेटे को जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया।

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नतीजतन उनका पुत्र विशाल शर्मा अब प्रधानमंत्री स्कालरशिप के लिए फार्म नहीं भर पाएगा। इंजीनियर बनने का सपना बिखर गया। दरअसल संविधान में बाद में जोड़े गए अनुच्छेद 35 कैपिटल ए की वजह से महिलाओं के मौलिक अधिकारों पर भी कैंची चली।
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इसी तरह वाल्मीकि समाज और गोरखों की तीन पीढ़ियां खप गईं, लेकिन उन्हें हक हासिल नहीं हो सका है। गोरखों की बहादुरी से प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने 1814 में नेपाल से गोरखों की अपनी सेना में भर्ती की थी।
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बाद में गोरखे जम्मू-कश्मीर के महाराजा की सेना के अंग बने। महाराजा ने उन्हें बसने के लिए जमीन भी दी। कर्नल रिटायर्ड राजेंद्र सिंह का दर्द है कि उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से जम्मू के गरोखानगर में घर तो बनाया, लेकिन मकान उनके नाम नहीं हो पा रहा है।

उन्हें आज तक जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी होने का प्रमाण पत्र नहीं मिला। वह दफ्तरों का चक्कर काटते रहे। गोरखानगर के शेर बहादुर राणा, करुणा क्षत्रिय, दुर्गा सिंह अधिकारी, वीरेंद्र सिंह प्रधान, धर्म बहादुर सबका दर्द एक जैसा है।

पूर्वजों के बलिदान के बाद गोरखा समाज के ये लोग जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा में जुटे हैं, लेकिन इनके बच्चों के लिए नौकरियों के दरबार बंद हैं। उच्च शिक्षा मुमकिन नहीं है।

इनकी भी सुन लीजिए

problem are not finish yet of nepali people who lives in jammu kashmir

वाल्मीकि  समाज की मीना गिल मेडिकल के लिए फार्म तक नहीं भर सकी। उसके लिए जरूरी स्थायी निवास प्रमाण पत्र उनके परिवार में किसी के पास नहीं है।

1957 में जम्मू नगर निगम में हड़ताल हुई तो सरकार अमृतसर और गुरदासपुर से सफाई कर्मचारियों को लेकर आई, ताकि शहर की गंदगी साफ हो सके। बाद में सरकार ने उन्हें बसने के लिए जम्मू में जमीन दी। पक्के मकान भी बनाकर दिए।

अब 58 साल बीत गए, लेकिन स्थायी निवासी का प्रमाण पत्र नहीं मिल सका। अनुच्छेद 35 ए के तहत वाल्मीकि समाज के ये लोग स्थायी निवासी की परिभाषा में नहीं आते हैं।

उसी तरह 1944 के बाद जम्मू कश्मीर आने वाले लोग इसके हकदार नहीं हैं। इन्हें जमीन खरीदने का अधिकार भी नहीं है। गोरखों और वाल्मीकि समाज के लोगों के लिए जम्मू कश्मीर सरकार ने सिविल सर्विस रेगुलेशन में प्रावधान कर यह व्यवस्था कर दी है कि गोरखे चौकीदार और वाल्मीकि समाज के लोग सिर्फ सफाई कर्मी की नौकरी पा सकते हैं।

वाल्मीकि समाज के घारू बट्टी कहते हैं कि बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में समानता के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया, लेकिन जम्मू कश्मीर में वाल्मीकि समाज के लोगों को यह हक नहीं मिला।

यहां सफाई कर्मी का बेटा सिर्फ सफाई कर्मी ही बन सकता है, वह तरक्की कर कोई और पद नहीं पा सकता। गांधीनगर महिला कालेज की प्रो. रश्मि कहती हैं कि महिलाएं जब किसी दूसरे राज्य के व्यक्ति से शादी कर लेती हैं तो उनके बच्चों से जम्मू कश्मीर के अधिकार छिन जाते हैं।

उनके बच्चों को स्थायी निवासी होने का प्रमाण पत्र नहीं मिलता। यह तब भी होता है, जब महिला के पति का परिवार लंबे समय से जम्मू कश्मीर में निवास कर रहा है।

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