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Jammu News: फीकी पड़ी पीडीपी की चमक, चुनाव से ज्यादा अस्तित्व की लड़ाई
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-गठन के तीन साल में सरकार बनाई, अब दर्जनों बड़े नेता कह चुके अलविदा
-इंडिया गठबंधन का हिस्सा फिर भी सीट शेयरिंग नहीं, खुद चुनाव में नहीं उतर रहीं महबूबा
अरुण कुमार
जम्मू। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सबसे तेजी से आगे बढ़ने और स्थापित पार्टियों में चिंता बढ़ाने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक (पीडीपी) 10 साल में ही अपनी चमक खो बैठी है। आज पार्टी के कई नेता उसका साथ छोड़ गए हैं। हालांकि नए लोग जुड़े भी हैं लेकिन उनको स्थापित होने में वक्त लगेगा। पार्टी की मुखिया महबूबा मुफ्ती के विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने, इंडिया गठबंधन का साथ नहीं लेने से भी पार्टी कई मोर्चों पर संघर्ष करती दिख रही है। खासकर जम्मू संभाग में। कश्मीर से बाहर पीडीपी का जनाधार अभी ऐसा नहीं है कि वो अकेले दम पर कोई करिश्मा दिखा पाए।
अपनी स्थापना के महज तीन साल बाद सत्ता में अकार सरकार बनाने वाली पीडीपी के लिए 2024 के विधानसभा चुनाव अपना अस्तित्व बचाने से कम के नहीं हैं। पार्टी एक तरफ अपने दम पर सत्ता में आने का दावा करती है तो दूसरी तरफ ये भी मानती है कि सरकार बनाने में वो किंग मेकर की भूमिका निभाएंगे। सियासी गुरुओं का मानना है कि पार्टी के विरोधाभासी बयान बताते हैं कि कई फैसलाें पर दुविधा में है। पहली दुविधा ये कि इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने के बाद पार्टी अकेले चलने को मजबूर है। न तो पार्टी इंडिया गठबंधन छोड़ पा रही है और उसके साथ चल पा रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी पीडीपी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी और कश्मीर संभाग की दो सीटों पर प्रत्याशी उतारे।
जनाधार कश्मीर तक, उम्मीदवार पूरे प्रदेश में उतारने की मजबूरी
कांग्रेस और नेकां की बीच गठबंधन होने के बाद अब पीडीपी के पास किसी से गठबंधन का रास्ता बाकी नहीं बचा। भाजपा से साथ गठबंधन को पीडीपी सिरे से नकार चुकी है। महबूबा मुफ्ती खुद कह चुकी हैं कि भाजपा से किसी सूरत में हाथ नहीं मिलाएंगी। ऐसे में उन्हें मजबूरन सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का फैसला लिया, जबकि पार्टी का जनाधार कश्मीर संभाग की कुछ एक सीटों पर ही है। 2014 में भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार बनाने के बाद पीडीपी सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। गठबंधन की सरकार टूटने के बाद पार्टी में टूट हो गई। अल्ताफ बुखारी, जुल्फकार चौधरी, इमरान अंसारी जैसे बड़े नेता पार्टी को छोड़ चुके हैं।
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स्थापना के बाद ऐसा रहा है पीडीपी का सफर
1999 में स्थापना के बाद पीडीपी ने 2002 में विधानसभा चुनाव 16 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। पार्टी प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद सईद तीन साल तक मुख्यमंत्री रहे। 2008 में पीडीपी को 21 सीटें मिलीं लेकिन सत्ता से बाहर रही। 2014 के चुनाव में पार्टी ने 28 सीटें जीतकर भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। मृत्यु से पहले तक मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री रहे, जबकि 2016 से 2018 तक महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री रहीं।
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-इंडिया गठबंधन का हिस्सा फिर भी सीट शेयरिंग नहीं, खुद चुनाव में नहीं उतर रहीं महबूबा
अरुण कुमार
जम्मू। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सबसे तेजी से आगे बढ़ने और स्थापित पार्टियों में चिंता बढ़ाने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक (पीडीपी) 10 साल में ही अपनी चमक खो बैठी है। आज पार्टी के कई नेता उसका साथ छोड़ गए हैं। हालांकि नए लोग जुड़े भी हैं लेकिन उनको स्थापित होने में वक्त लगेगा। पार्टी की मुखिया महबूबा मुफ्ती के विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने, इंडिया गठबंधन का साथ नहीं लेने से भी पार्टी कई मोर्चों पर संघर्ष करती दिख रही है। खासकर जम्मू संभाग में। कश्मीर से बाहर पीडीपी का जनाधार अभी ऐसा नहीं है कि वो अकेले दम पर कोई करिश्मा दिखा पाए।
अपनी स्थापना के महज तीन साल बाद सत्ता में अकार सरकार बनाने वाली पीडीपी के लिए 2024 के विधानसभा चुनाव अपना अस्तित्व बचाने से कम के नहीं हैं। पार्टी एक तरफ अपने दम पर सत्ता में आने का दावा करती है तो दूसरी तरफ ये भी मानती है कि सरकार बनाने में वो किंग मेकर की भूमिका निभाएंगे। सियासी गुरुओं का मानना है कि पार्टी के विरोधाभासी बयान बताते हैं कि कई फैसलाें पर दुविधा में है। पहली दुविधा ये कि इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने के बाद पार्टी अकेले चलने को मजबूर है। न तो पार्टी इंडिया गठबंधन छोड़ पा रही है और उसके साथ चल पा रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी पीडीपी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी और कश्मीर संभाग की दो सीटों पर प्रत्याशी उतारे।
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जनाधार कश्मीर तक, उम्मीदवार पूरे प्रदेश में उतारने की मजबूरी
कांग्रेस और नेकां की बीच गठबंधन होने के बाद अब पीडीपी के पास किसी से गठबंधन का रास्ता बाकी नहीं बचा। भाजपा से साथ गठबंधन को पीडीपी सिरे से नकार चुकी है। महबूबा मुफ्ती खुद कह चुकी हैं कि भाजपा से किसी सूरत में हाथ नहीं मिलाएंगी। ऐसे में उन्हें मजबूरन सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का फैसला लिया, जबकि पार्टी का जनाधार कश्मीर संभाग की कुछ एक सीटों पर ही है। 2014 में भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार बनाने के बाद पीडीपी सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। गठबंधन की सरकार टूटने के बाद पार्टी में टूट हो गई। अल्ताफ बुखारी, जुल्फकार चौधरी, इमरान अंसारी जैसे बड़े नेता पार्टी को छोड़ चुके हैं।
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स्थापना के बाद ऐसा रहा है पीडीपी का सफर
1999 में स्थापना के बाद पीडीपी ने 2002 में विधानसभा चुनाव 16 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। पार्टी प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद सईद तीन साल तक मुख्यमंत्री रहे। 2008 में पीडीपी को 21 सीटें मिलीं लेकिन सत्ता से बाहर रही। 2014 के चुनाव में पार्टी ने 28 सीटें जीतकर भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। मृत्यु से पहले तक मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री रहे, जबकि 2016 से 2018 तक महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री रहीं।