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Jammu News: श्रीनगर में प्रधानमंत्री ने पहाड़ी पर बसे शंकराचार्य मंदिर को निहारा
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैली स्थल पर पहुंचने से पहले एक जगह रुक कर पहाड़ी पर बसे शंकराचार्य मंदिर को निहारा और हाथ जोड़कर नमन किया। इसकी तस्वीरें प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल पर साझा की गईं।
शंकराचार्य मंदिर श्रीनगर में जबरवान रेंज पर शंकराचार्य पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। कश्मीरी हिंदुओं का दृढ़ विश्वास है कि इस मंदिर में आदि शंकराचार्य ने दौरा किया था और तब से यह मंदिर उनके साथ जुड़ा हुआ है। इस तरह मंदिर और पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पड़ा। कश्मीरी पंडितों की इस मंदिर में गहरी आस्था है। शिवरात्रि के पर्व पर जिसे कश्मीर में हेरथ के नाम से भी जाना जाता है, यहां पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
मंदिर घाटी तल से 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर से पूरे श्रीनगर शहर को देख जा सकता है। मंदिर और निकटवर्ती भूमि राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत केंद्रीय रूप से संरक्षित किया गया है। जम्मू कश्मीर के धर्मार्थ ट्रस्ट ने क्षेत्र के अन्य लोगों के साथ मिलकर 19वीं सदी से इस मंदिर का प्रबंधन करता आ रहा है।
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श्रीनगर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैली स्थल पर पहुंचने से पहले एक जगह रुक कर पहाड़ी पर बसे शंकराचार्य मंदिर को निहारा और हाथ जोड़कर नमन किया। इसकी तस्वीरें प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल पर साझा की गईं।
शंकराचार्य मंदिर श्रीनगर में जबरवान रेंज पर शंकराचार्य पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। कश्मीरी हिंदुओं का दृढ़ विश्वास है कि इस मंदिर में आदि शंकराचार्य ने दौरा किया था और तब से यह मंदिर उनके साथ जुड़ा हुआ है। इस तरह मंदिर और पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पड़ा। कश्मीरी पंडितों की इस मंदिर में गहरी आस्था है। शिवरात्रि के पर्व पर जिसे कश्मीर में हेरथ के नाम से भी जाना जाता है, यहां पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
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मंदिर घाटी तल से 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर से पूरे श्रीनगर शहर को देख जा सकता है। मंदिर और निकटवर्ती भूमि राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत केंद्रीय रूप से संरक्षित किया गया है। जम्मू कश्मीर के धर्मार्थ ट्रस्ट ने क्षेत्र के अन्य लोगों के साथ मिलकर 19वीं सदी से इस मंदिर का प्रबंधन करता आ रहा है।
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