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जम्मू-कश्मीरः सुरक्षा की गारंटी के साथ ही घर वापसी चाहते हैं कश्मीरी विस्थापित

Thu, 11 Jun 2020 02:00 PM IST
प्रशांत कुमार ओमपाल संब्याल, जम्मू
ओमपाल संब्याल, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Thu, 11 Jun 2020 02:00 PM IST
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Kashmiri displaced want to return home with guarantee of security
कश्मीरी पंडित - फोटो : अमर उजाला, फाइल फोटो

अनुच्छेद 370 हटने और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने से कश्मीरी पंडित परिवारों में घर वापसी की उम्मीद के बीच सरपंच अजय पंडिता की हत्या से सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। कश्मीरी पंडित समुदाय ने ‘होमलैंड’ को एकमात्र विकल्प बताया है, जिसमें सुरक्षा की गारंटी सबसे जरूरी है।

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पनुन कश्मीर के अध्यक्ष डॉ. अजय च्रुंगू के अनुसार अनुच्छेद 370 तो हटा है लेकिन व्यवस्था की सोच नहीं बदली है। कश्मीर में हुए जातीय नरसंहार को महज विस्थापन की संज्ञा दे दी गई। सरपंच अजय पंडिता की हत्या इस जातीय नरसंहार की कड़ी है। केंद्र को कश्मीरी हिंदुओं के लिए अलग और सुरक्षित होमलैंड देना होगा, जिसका सांविधानिक स्वरूप एक और केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर हो।
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पूर्व नौकरशाह और विश्व कश्मीरी समाज के संस्थापक किरन वातल कहते हैं कि घाटी में आतंकी तंजीमों के ओवरग्राउंड वर्कर और समर्थकों का बड़ा नेटवर्क है। इसलिए देश के साथ खड़े होकर उठने वाली आवाज हमेशा के लिए खामोश कर दी जाती है। सरपंच अजय पंडिता के साथ भी ऐसा ही हुआ। पांच हजार साल से घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडित समाज की घर वापसी के लिए होमलैंड ही एकमात्र विकल्प है। इसकी शुरुआत सुविधाओं और सुरक्षा से लैस स्मार्ट सिटी हो सकती है। इसमें देरी करना और भी घातक होगा।

1996 में घाटी लौटे थे अजय पंडिता
सरपंच अजय पंडिता ने अपने नाम के साथ भारती लगाया था। वह 1996 में कश्मीर लौटे और सेब और बादाम के बाग को पुनर्जीवित करने करने लगे। अजय के एक रिश्तेदार ने बताया कि उनके बाग के सभी पेड़ काट दिए गए थे। इसके बाद से वह साल में महीनों तक वहीं रहने लगे। स्थानीय लोगाें ने उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए बाद में उन्हें सरपंच चुना। अजय के पिता तो कहते हैं कि सरकार केवल कश्मीरी पंडितों का कश्मीर मुद्दे के लिए इस्तेमाल कर रही है।

 

घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडित परिवारों में खौफ

अजय पंडिता की हत्या से कश्मीर घाटी में रह रहे 600 से ज्यादा परिवारों में भी खौफ है। इनमें से ज्यादातर वे परिवार हैं जो पहले से वहीं रह रहे हैं। वहीं घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित समुदाय के करीब तीन हजार युवा भी हैं। इन्हें प्रधानमंत्री विशेष पैकेज के तहत नौकरी दी गई थी। केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कश्मीरी विस्थापित परिवारों को 6000 पदों पर भर्ती का पैकेज दिया था। करीब तीन हजार की भर्ती भी हुई।

ये कर्मचारी गांदरबल, बडगाम के शेखपोरा और काजीगुंड के वेसू क्षेत्र में ट्रांजिट कॉप्लेक्स में रहते हैं। घाटी में हालात बिगड़ने पर इन्हें जम्मू आना पड़ता है। सरपंच अजय पंडिता ने सुरक्षा की मांग की थी, जो उन्हें नहीं मिली। पनुन कश्मीर के अध्यक्ष डॉ. अजय च्रुंगू के अनुसार घाटी में रह रहे परिवारों को विशेष सुरक्षा नहीं दी जाती है।
 

अजय पंडिता का परिवार विभाग के साथ पंजीकृत है। वर्तमान में जम्मू में कुल 43,930 कश्मीरी विस्थापित परिवारों के 1,53,341 सदस्य पंजीकृत हैं। इनमें से 39,576 परिवार कश्मीरी हिंदू हैं। बड़ी संख्या में परिवार दूसरे राज्यों में भी रह रहे हैं।- टीके भट्ट, राहत एवं पुनर्वास आयुक्त, जम्मू-कश्मीर

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