Jammu Kashmir: 100 साल में पहली बार रावण वध होगा डोगरी में, बिल्लू मंदिर रामलीला में हुआ ऐतिहासिक बदलाव
जम्मू के पंजतीर्थी क्षेत्र के बिल्लू मंदिर में चल रही रामलीला में 100 वर्ष में पहली बार रावण वध होगा। रामलीला के संवाद भी डोगरी में होंगे। इसके अलावा राम-रावण और सीता सहित सब कलाकार डोगरा पारंपरिक परिधानों में नजर आ रहे हैं।
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पंजतीर्थी क्षेत्र के बिल्लू मंदिर में चल रही रामलीला में 100 वर्ष में पहली बार रावण वध होगा। रामलीला के संवाद भी डोगरी में होंगे। इसके अलावा राम-रावण और सीता सहित सब कलाकार डोगरा पारंपरिक परिधानों में नजर आ रहे हैं। इसके मंचन के लिए 20 मिनट का समय रखा गया है। रामलीला का मंचन करवाने वाले सरस्वती ड्रामेटिक क्लब के निदेशक ने बताया कि रावण वध न करने के पीछे कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर का न होना था। हम जाली तरीके से सीन नहीं दिखाना चाहते थे। इस बार हमने बैकग्राउंड के लिए विशेष आडियो रिकार्ड करवाया है। इसको सुनकर लोगों को युद्ध के महौल का अनुभव होगा। प्रभु राम का तीर इधर-उधर न लगकर सीधा रावण की नाभि में लगे इसके लिए भी तकनीकी बदलाव किए गए हैं।
सरस्वती ड्रामेटिक क्लब ने 1924 में यहां पहली बार रामलीला का मंचन शुरू किया। इसके बाद से अब तक इसमें कई परिवर्तन आए। डोगरी में संवाद इसका जीवंत उदाहरण है। इस मंच से पहली बार राम और रावण के बीच संवाद सुनने को तो मिलेंगे ही, वो भी स्थानीय भाषा में। इसके लिए कलाकारों ने खूब रिहर्सल की है।
सरस्वती ड्रामेटिक क्लब के निदेशक अनूप वर्मा के अनुसार समय के अनुसार अब रामलीला के मंचन में बदलाव किया जा रहा है। सदियों से चली आ रही कई परंपराओं को बदला जा रहा है। शुक्रवार की रात 10.30 बजे राम और रावण के बीच होने वाले युद्ध का मंचन भी पहली बार ही होगा। मंचन में परिवर्तन लाने के पीछे एक उद्देश्य क्लब के प्रयासों की डोल्डन जुबली को भी यादगार बनाना है।हीरा लाल वर्मा ने किया रामायण का डोगरी अनुवाद
अनूप वर्मा ने बताया कि रामलीला का मंचन डोगरी संवादों के साथ करना एक प्रयोग था। हमें नहीं पता था कि यह कामयाब होगा या नहीं, लेकिन लोगों की संख्या को देखकर लगता है कि डोगरी संवाद आकर्षण का केंद्र बने हैं। हिंदी में संवाद सुनकर लोग शायद कुछ ऊब चुके थे। अब उन्हें नवीनता दिख रही है।पहली बार राम पगड़ी और चूड़ीदार पायजामे में, सीता सूट में दिखी।
बिल्लू मंदिर में होने वाले रामलीला मंचन के 100 साल यादगार बनाने के लिए कलाकारों की पोशाकें भी बदली गई हैं। यहां पर अब राम न तो मुकुट में नजर आ रहे हैं और न ही राजशाही पोशाक में। यहां तक की माता सीता भी साड़ी में नहीं दिखाई जा रहीं। राम के लिए अब डोगरी परंपरा के अनुसार ड्रेस तैयार करवाई है जिसमें प्रभु राम कुर्ते और चूड़ीदार पायजामें मे नजर आ रहे हैं। एक भी कलाकार ऐसा नहीं है जिसकी ड्रेस डोगरा परंपरा के अनुसार न हो। लोगों को ये बदलाब खूब पसंद आ रहा है।
क्यों पड़ा मंदिर का नाम बिल्लू मंदिरबिल्लू मंदिर के नाम से जाने जाते राधे-श्याम मंदिर का निर्माण 1839 में भाई चरण दास द्वारा करवाया गया था। बताया जा है कि मंदिर के पुजारी का नाम बिल्लू था। लंबे समय तक इन्होंने ही मंदिर की देखरेख की। इसके नाम पर ही बाद में यह मंदिर प्रसिद्ध हो गया। अब लोग इसे राधे-श्याम के नाम से कम बिल्लू मंदिर के नाम से ज्यादा जानते हैं।
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