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Jammu : सबूत कमजोर...आतंकी केस में सरकार की अपील खारिज, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया

Wed, 23 Jul 2025 12:27 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 23 Jul 2025 12:27 AM IST
सार

अदालत ने साफ कहा कि इस गंभीर मामले की जांच में कई खामियां हैं और सबूतों के अभाव में आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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Jammu: Evidence is weak...Government's appeal rejected in terror case
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 2005 में जम्मू में दर्ज एक आतंकी साजिश और हथियार बरामदगी के मामले में जम्मू-कश्मीर सरकार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने साफ कहा कि इस गंभीर मामले की जांच में कई खामियां हैं और सबूतों के अभाव में आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दो आरोपियों की रिहाई बरकरार रखी।

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यह आदेश न्यायमूर्ति सिंधु शर्मा और शहजाद अजीम की खंडपीठ ने जम्मू-कश्मीर राज्य बनाम तजिंदर सिंह एवं रविंदर सिंह के मामले में दिया। मामले के अनुसार गांधीनगर पुलिस को 24 अगस्त 2005 को सूचना मिली कि कुछ लोग खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स (केजेडएफ) जैसे आतंकी संगठन से जुड़े हैं और आईएसआई के इशारे पर युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। इसपर सतवारी चौक पर नाका लगाकर तजिंदर सिंह और रविंदर सिंह को पकड़ा गया था।
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पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर हथियार छिपाने की बात स्वीकार की, जो निक्की तवी इलाके से बरामद किए गए। मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को रिहाई दे दी। इसके बाद सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की थी। सरकार की ओर से कहा गया कि हथियार और विस्फोटक बरामद हुए हैं, जो गंभीर अपराध की पुष्टि करते हैं। इसपर बचाव पक्ष ने अदालत के सामने कई खामियां उजागर कीं।
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गवाहों के बयान में विरोधाभास...मौके पर मौजूद लोगों को नहीं बनाया गवाह
न्यायमूर्ति सिंधु शर्मा और शहजाद अजीम की खंडपीठ ने माना कि गवाही में विरोधाभास है। किसी ने कहा कि आरोपी पैदल चल रहे थे, तो किसी ने कहा कि वे मेटाडोर में थे। एक गवाह ने कहा कि बरामदगी के लिए सीधे घटनास्थल गए, जबकि बाकी का कहना था कि पहले थाने लाया गया। इसके अलावा सबने बरामदगी का तरीका भी अलग-अलग बताया।


खोदाई के लिए जिस औजार का जिक्र किया गया, उसे पेश नहीं किया गया। अदालत ने इस बात पर गंभीर सवाल उठाए। बरामद सामान को कैसे सील किया गया, कहां रखा गया, इसका भी रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं था। सबसे अहम बात यह रही कि किसी भी स्वतंत्र नागरिक को गवाह नहीं बनाया गया, जबकि पुलिस ने माना कि मौके पर आम लोग मौजूद थे।

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