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Jammu News: घाटी में बाढ़ संकट को लेकर हाईकोर्ट सख्त, आज पेश होंगे अधिकारी

Tue, 09 Sep 2025 01:47 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू Updated Tue, 09 Sep 2025 01:47 AM IST
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High court is strict about flood crisis in the valley, officials will appear today
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने पर्यावरण नीति समूह (ईपीजी) बनाम भारत संघ एवं अन्य संबंधी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान घाटी में बाढ़ संकट पर कड़ा रुख दिखाया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आदेश दिया कि सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के आयुक्त/सचिव, आवास एवं शहरी विकास विभाग के आयुक्त/सचिव और कश्मीर के संभागीय आयुक्त को नौ सितंबर को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार को एक विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) दाखिल करने का भी निर्देश दिया गया है।
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याचिकाकर्ता और ईपीजी संयोजक फैज बख्शी द्वारा दाखिल छह पन्नों की रिपोर्ट में बाढ़ नियंत्रण उपायों की कमियों, घाटी में जानमाल को संभावित खतरे और पारिस्थितिकी पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई कि जब तक ठोस रणनीति तैयार न हो, तब तक सरकारी भवनों और अन्य सुविधाओं के लिए भूमि आवंटन न किया जाए। साथ ही आर्द्रभूमि से 500 मीटर के दायरे में निर्माण, बिक्री और भूमि हस्तांतरण तत्काल रोके जाने की बात कही गई।
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अदालत ने राख अर्थ, ट्रांसवर्ल्ड विश्वविद्यालय और आईआईएम श्रीनगर जैसी परियोजनाओं पर रोक लगाने की अनुशंसा को भी संज्ञान में लिया और सरकार को त्वरित कदम उठाने के निर्देश दिए।
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रिपोर्ट में उठाए गए मुख्य बिंदु





जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने 2025 की बाढ़ को लेकर गंभीर हालात पर चिंता जताई है। रिपोर्ट में सरकार की लापरवाही, अधूरी योजनाओं और अव्यावहारिक प्रस्तावों को साफ-साफ उजागर किया गया है।









फंड का सही इस्तेमाल नहीं - 1,623 करोड़ रुपये की DPR बनी थी, लेकिन अब तक सिर्फ 131 करोड़ रुपये ही खर्च हुए। पिछले तीन साल से बाढ़ नियंत्रण के लिए बजट में कोई राशि नहीं रखी गई।






योजना अब भी अधर में - 2014 की तबाही को 11 साल हो गए, लेकिन सरकार आज तक यह तय नहीं कर पाई कि कौन सी योजना अपनाई जाए।

डोगरीपोरा बाईपास चैनल अव्यावहारिक - नया चैनल बनाने की बात हो रही है लेकिन यह बेहद महंगा, पर्यावरण के लिए नुकसानदेह और घाटी की क्षमता से बाहर है।

जमीन अधिग्रहण असंभव - सरकार दशकों से छोटे-छोटे प्लॉट भी नहीं ले पाई, तो हजारों कनाल जमीन कैसे लेगी?
जलनिकासी की बड़ी समस्या - वुलर झील की निकासी सुधारी नहीं गई, शहर के नालों की हालत खराब है, जिसके कारण शहरी बाढ़ तेजी से बढ़ रही है।

सरकार की उदासीनता - विशेषज्ञों की राय अनसुनी की जा रही है, और जिनके पास अधिकार हैं वे निर्णय लेने को तैयार नहीं।

समाधान का रास्ता - रिपोर्ट ने साफ कहा कि घाटी को बचाने का एकमात्र उपाय ‘फ्लड मॉडरेशन’ है। इसके लिए छोटे-छोटे स्टोरेज और मिनी डैम बनाने होंगे, जिन्हें सौर ऊर्जा से जोड़कर बिजली उत्पादन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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