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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Gulshan Kumar of Kathua district had to walk 35 kilometers carrying his wife's body

आंखों में आंसू, कंधे पर पत्नी का शव: 18 घंटे तक 35 किलोमीटर पैदल चले गुलशन; रास्ते में कीचड़, पत्थर और बारिश

Tue, 26 Aug 2025 05:01 AM IST
विजय पुंडीर हाफिज कुरैशी, अमर उजाला, बनी
हाफिज कुरैशी, अमर उजाला, बनी Published by: विजय पुंडीर Updated Tue, 26 Aug 2025 05:01 AM IST
सार

कठुआ जिले में पिछले कई दिनों से बारिश हो रही है और 24 अगस्त की सुबह तो यह बनी समेत जिले के कई हिस्सों में तबाही आई। कठुआ जिले के ढग्गर निवासी गुलशन कुमार के लिए इस बार की बारिश जीवन के सबसे कठिन दिन लेकर आई। उनकी पत्नी गर्भवती थी। जिसकी मौत हो गई। गुलशन को पत्नी के शव को कंधे पर लेकर पैदल 35 किलोमीटर चलना पड़ा।

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Gulshan Kumar of Kathua district had to walk 35 kilometers carrying his wife's body
प्रसूता के शव को पैदल लेकर जाते हुए - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दुर्गम पथरीला रास्ता, आंखों में आंसू और कंधे पर पत्नी का शव...। बरसते बादल भी गुलशन कुमार की आंखों से बहते आंसू नहीं छिपा पा रहे थे। ये आंसू छिपते भी कैसे वह अपने जीवन की सबसे कठिन राह पर थे। उन्हें पत्नी ऊषा देवी का शव गांव ले जाने के लिए 35 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। सोमवार की देर रात को वह ढग्गर पहुंच गए थे। भारी बारिश और भूस्खलन के चलते कठुआ से ढग्गर का सीधा सड़क संपर्क टूटा है। ऐसे में वह हिमाचल के रास्ते गांव पहुंचे जिससे पांच घंटे के सफर में 18 घंटे लग गए।

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कठुआ जिले के ढग्गर निवासी गुलशन कुमार के लिए इस बार की बारिश जीवन के सबसे कठिन दिन लेकर आई। उनकी पत्नी गर्भवती थी। उन्हें बनी उप जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गुलशन के रिश्तेदार ने बताया कि यहां नवजात की मौत हो गई। ऊषा की हालत गंभीर होने पर 22 अगस्त को जीएमसी कठुआ रेफर कर दिया गया। 24 अगस्त की रात करीब आठ बजे उनकी मौत हो गई। परिवार चाहता था कि अंतिम संस्कार पैतृक गांव ढग्गर में किया जाए।

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कठुआ जिले में पिछले कई दिनों से बारिश हो रही है और 24 अगस्त की सुबह तो यह बनी समेत जिले के कई हिस्सों में तबाही आई। इस हालात में गुलशन के गांव का रास्ता भी भूस्खलन के कारण बंद था। गुलशन ने बताया कि रास्ता बंद होने से वह कठुआ से सीधे अपने गांव ढग्गर नहीं जा सकते थे। इसलिए हिमाचल से होते हुए जाना तय किया।


 

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पत्नी का शव लेकर गुलशन सोमवार की सुबह एंबुलेंस से रवाना हुए और हिमाचल होते हुए माश्का तक पहुंचे। यहां से पैदल पेपड़ी गांव तक गए। यहां उन्होंने फिर गाड़ी की और डुग्गन गांव पहुंचे। इसके बाद वहां से 10 किलोमीटर दूर ढग्गर गांव तक पहुंचे। पूरे रास्ते में उन्हें शव को कंधों पर रखकर 35 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।

मुस्लिमों ने भी दिया कंधा
माश्का से पेपड़ी गांव के बीच रास्ते में पस्सियां गिरी हैं। वहां से निकलना मुश्किल था। वहां से निकलने में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने शव को कंधा देकर उनकी मदद की।

रास्ते में कीचड़ था, बारिश की मार थी पर नहीं रुके कदम
गांव के लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक शवयात्रा नहीं थी बल्कि यह एक पति के संघर्ष और प्रेम की अद्भुत मिसाल है। रास्ते में कीचड़, पत्थर और बारिश की मार थी लेकिन गुलशन के कदम नहीं रुके। ऊषा की मौत और गुलशन के संघर्ष ने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर किया।

लोग बोले- हमें अच्छे रास्ते चाहिए
गुलशन के गांव के लोगों ने ही नहीं, रास्ते में पड़ने वाले क्षेत्र के निवासियों ने भी इस अंतिम यात्रा को देखा। लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि एक पूरे क्षेत्र की आवाज है जो कह रही है कि हमें अच्छे रास्ते चाहिए। समय पर मदद चाहिए और सबसे बढ़कर इंसानियत चाहिए। बता दें कि जिले के दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए सड़क की बहुत अच्छी सुविधा नहीं हैं। परिवहन के साधन भी सीमित हैं।

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