रियासत में मंडरा रहा वित्तीय संकट, विकास कार्य ठप
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रियासत में वित्तीय संकट गहरा गया है। सरकार ने ईद के मौके पर कर्मचारियों के वेतन-पेंशन और अन्य जरूरी खर्चों के लिए 765 करोड़ के बिलों का भुगतान किया लेकिन अब भी लगभग एक हजार करोड़ के बिल कोषागारों में लंबित हैं।
एक सप्ताह पहले 400 करोड़ के बिलों का भुगतान किया गया था। फिलहाल राज्य सरकार ने बाजार से 300 करोड़ का कर्ज लेकर दैनिक कामकाज का बंदोबस्त किया है लेकिन अगले महीने संकट और गहरा सकता है।
रियासत सरकार को उम्मीद है कि 31 जुलाई को लोकसभा का बजट सत्र समाप्त होने के बाद वार्षिक योजना को केंद्र से मंजूरी मिल जाएगी लेकिन इसमें भी कई पेंच हैं।
सेल्स टैक्स से काम चला रही है सरकार
रियासत सरकार फिलहाल सेल्स टैक्स एवं राजस्व वसूली से मिलने वाली राशि से अपना काम चला रही है। दरअसल केंद्र सरकार ने अब तक योजना आयोग का पुनर्गठन नहीं किया है।
वार्षिक योजना की मंजूरी योजना आयोग ही करता रहा है। हालांकि, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली विशेष परिस्थिति में इसकी मंजूरी दे सकते हैं लेकिन उसके आसार कम दिखते हैं।
केंद्र सरकार योजना आयोग को समाप्त करने पर भी विचार कर रही थी। इस वजह से असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
विधानसभा चुनाव भी बने रोड़ा
इस कारण विकास कार्यों के लिए सिर्फ एक माह बाकी है और आर्थिक संकट ने विकास रथ के पहिए जाम कर दिए हैं। जम्मू कश्मीर सरकार ने 7300 करोड़ की वार्षिक योजना बनाई है।
केंद्र प्रायोजित योजनाओं में 4000 करोड़ रुपये और प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण कार्यक्रम के 600 करोड़ रुपये मिलाकर आंकड़ा 11 हजार 900 करोड़ का बनता है।
बाजार से ऋण लेना रूटीन का हिस्सा
रियासत सरकार ने जरूरी कामकाज को जारी रखने के लिए 50 प्रतिशत राशि खर्च का अधिकार संबंधित विभागों को दिया था। विकास कार्यों के लिए अब फंड का टोटा हो गया है।
पुराने बिलों के भुगतान में देर के कारण भी स्थिति गंभीर हुई है। ऐसे में रियासत को फिर से बाजार से ऋण लेना पड़ सकता है। यह ऋण केंद्र सरकार की मंजूरी से रिजर्व बैंक रूट से मिलेगी जिसपर रियासत सरकार को 8.9 प्रतिशत का ब्याज अदा करना पडे़गा।
योजना एवं विकास विभाग के प्रधान सचिव बी आर शर्मा का कहना है बाजार से ऋण लेना रूटीन का हिस्सा है। यह केंद्र सरकार की मंजूरी से होता है और अधिकांश राज्य सरकारें जरुरत के हिसाब से ऋण लेती हैं।