अफजल की फांसी के मुद्दे पर बैकफुट पर आए फारूक अब्दुल्ला
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के बिगड़े बोल भी उनके लिए अलगाववादियों का समर्थन जुटाने में विफल हो रहे हैं। अलगाववादियों का संयुक्त मोर्चा चुनाव बहिष्कार पर अड़ा है और अलगाववादियों ने अपने अभियान में मस्जिद कमेटियों को भी शामिल करने में सफलता हासिल कर ली है।
मस्जिदों से भी चुनाव बहष्किार की अपीलें जारी होने लगीं हैं। उपद्रवी तत्व हिंसा और पत्थरबाजी के लिए माहौल तैयार करने में जुटे हैं। पीडीपी ने विकास और पर्यटन विस्तार को मुद्दा बनाया है। तनावपूर्ण माहौल के कारण मतदान का प्रतिशत गिरने के आसार हैं।
श्रीनगर में 9 अप्रैल को उप चुनाव है। इसी सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला किस्मत आजमा रहे हैं। पीडीपी ने कांग्रेस से आए नाजिर खान को प्रत्याशी बनाया है। यह सीट नेशनल कांफ्रेंस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है लेकिन पिछले चुनाव में यहां नेकां को पीडीपी से मात खानी पड़ी थी।
नहीं काम आ रहा है फारूक का चुनावी पैंतरा
सियासी समीकरण में बदलाव के बाद अब पीडीपी के टिकट पर जीते तारिक हमिद कर्रा भी फारूक के साथ खड़े हैं। लिहाजा पीडीपी के लिए चुनौती बड़ी है। चुनावी बीजगणित में सियासी फार्मूले के तहत फारूक ने इस चुनाव में अलगाववादियों को खुलकर अपनापन दिखाया है।
फारूक पत्थरबाजों का भी समर्थन कर रहे हैं और अमेरिका की मध्यस्थता के पक्ष में भी खड़े हो गए हैं। लेकिन उनका यह पैंतरा काम नहीं कर रहा है। अलगाववादियों ने उन्हें समर्थन से इनकार कर दिया है।
चूंकि पीडीपी अभी सत्ता में है इसलिए अफजल गुरु की फांसी के मुद्दे को सीधे तौर पर नहीं उठा रही है, लेकिन उम्मत-ए-इस्लामी ने चुनाव में इसे मुद्दा बना दिया है।
अफजल गुरू की फांसी के मुद्दे पर घिरे फारूक
उम्मत-ए-इस्लामी के चेयरमैन मीरवाइज काजी अहमद यासिर ने अफजल गुरु की फांसी के लिए नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को जिम्मदार ठहराया है। मीरवाइज काजी ने कहा कि अफजल गुरु को जब फांसी दी गई तब जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस की हुकूमत थी और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे।
उस वक्त केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार काबिज थी। उन्होंने हर जलसे में फारूक से अफजल गुरु की फांसी पर जवाब मांगना शुरू कर दिया है। उम्मत-ए -इस्लामी का यह दांव फारूक पर भारी पड़ रहा है।
नेकां ने इस मुद्दे पर खामोशी ओढ़ ली है। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सत्ता से बाहर रहते हुए पहले इस मुद्दे को तूल दिया था। उम्मत-ए-इस्लामी अब उनकी खामोशी पर भी सवाल उठा रही है।