विजयपुर। गुड़ा सलाथिया की बाग मंडी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा वाचक कुलदीप शास्त्री ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना ही चाहिए। संसारी माया के ही वशीभूत रहने पर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाती है, क्योंकि माया बड़ी चंचल है, वह पीछा करते हुए भागवत कथा, देव दर्शन और तीर्थ स्थानों में भी हमारे साथ साथ चलती रहती है।
कथा वाचक ने कहा कि राजा भरत अपने संपूर्ण साम्राज्य का परित्याग कर वन में तप करने चले गए थे, किंतु वहां एकांत में भी मृग की माया से वशीभूत हो गए और अपने अंत समय में अमरीका का ही स्मरण करते रहे। अंते या मती सा गति परिणाम स्वरूप उन्हें मृग की योनि में जन्म प्राप्त हुआ। कुलदीप शास्त्री ने बताया कि आशा ही दुख का कारण है। भगवान शिव के मना करने पर भी सती मन में बड़ी आशा लेकर अपने पिता के घर चली गई जहां सती की आशा पूरी नहीं हुई। मान सम्मान नहीं होने तथा अपने पति भगवान शिव जी का यज्ञ में स्थान नहीं देख कर सती अग्नि कुंड में समा गई थी। भक्त प्रहलाद के कहने पर भगवान खंभे से प्रकट होकर अपने भक्तों की रक्षा किए थे, हमारी भावना यदि अच्छी है, तो भगवान हमें कहीं भी मिल सकते हैं। भक्त और भगवान के बीच में अहंकार रूपी दिवार ही तो बाधा बनकर खड़ी हो जाती।