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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Amar ujala Hindi Hain Hum campaign, With Dogri Kashmiri, Hindi will tie the entire state in one thread

#हिंदी हैं हम: डोगरी-कश्मीरी को साथ लेकर पूरे प्रदेश को एक सूत्र में बांधेगी हिंदी

Thu, 03 Sep 2020 11:58 AM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Thu, 03 Sep 2020 11:58 AM IST
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Amar ujala Hindi Hain Hum campaign, With Dogri Kashmiri, Hindi will tie the entire state in one thread
हिंदी की महत्ता को लेकर साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने दी राय - फोटो : अमर उजाला

जम्मू-कश्मीर में उर्दू और अंग्रेजी के साथ हिंदी, डोगरी और कश्मीरी को आधिकारिक भाषा बनाए जाने के विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी से प्रदेश की बड़ी आबादी में खुशी की लहर है। जम्मू संभाग में डोगरी और कश्मीर संभाग में कश्मीरी भाषा सबसे लोकप्रिय है। इनमें हिंदी भाषा दोनों संभागों में बोली जाती है, जो स्थानीय भाषाओं को साथ लेकर प्रदेश में एकता के सूत्र को और मजबूत करेगी। वर्तमान में सरकारी कामकाज उर्दू और अंग्रेजी तक सीमित है। ऐसे में तीन लोकप्रिय भाषाओं के शामिल करने की कवायद को भाषा से जुड़े लोग बेहद महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। डोगरी जम्मू संभाग के 10 जिलों में बोली जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 50 लाख के करीब आबादी डोगरी बोलती है। लंबे संघर्ष के बाद डोगरी को वर्ष 2003 में वाजपेयी सरकार ने संविधान की आठवीं अनुसूचित में शामिल करने का फैसला लिया था।

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इतिहास में भी जम्मू-कश्मीर और शेष भारत के बीच हिंदी ने ही किया सेतु का काम
हिंदी पूरे देश को जोड़ने का सबसे मजबूत माध्यम है। जम्मू का भी हिंदी से गहरा जुड़ाव रहा है। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में भी हिंदी का महत्व रहा है। यहां के राजाओं का दिल्ली और अन्य राज्यों में हिंदी ने ही संवाद कराया। हिंदी के आधिकारिक भाषा बनने से सबसे बड़ा लाभ यहां के किसानों को होगा, क्योंकि पहले सभी रिकॉर्ड उर्दू की फारसी शब्दावली में लिखे जाते थे। उसे सिर्फ पटवारी या कुछ लोग ही समझ सकते हैं। हिंदी में रिकॉर्ड होने से पारदर्शिता आएगी। यहां की संस्कृति, इतिहास और साहित्य पर हिंदी में लिखे जाने से उसे पूरा देश पढ़ेगा। इसके बाद उसे अन्य भाषाओं में अनुवादित होकर पहचान बनाने का अवसर मिलेगा। आधिकारिक भाषा होने के चलते निश्चित रूप से हिंदी को भी पंख लगेंगे। अब इसके बढ़ावे और संरक्षण पर ध्यान देने की जरूरत है। -डॉ. ओम गोस्वामी, वरिष्ठ साहित्यकार  
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प्रोत्साहन को मिलेगी राशि, बनेगी नीति
प्रदेश की दो बड़ी क्षेत्रीय भाषाओं में डोगरी और कश्मीरी को आधिकारिक भाषा मिलने के बाद इनसे संबंधित नीति बनेगी। भाषा विकास को सरकारी फंड भी जारी होंगे। भाषाओं के विस्तार की संभावना बढ़ेगी। कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी केंद्र के फैसले का स्वागत करती है और बेहतरी के कार्य को लेकर आशान्वित है। -डॉ. अरविंदर सिंह अमन, अतिरिक्त सचिव सांस्कृतिक अकादमी  
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कश्मीरी प्रतिनिधियों से बातचीत
सरकार का फैसला स्वागत योग्य है। जम्मू-कश्मीर में भाषा पर राजनीति चलाई जा रही थी। डोगरी और कश्मीरी लोग जम्मू-कश्मीर में सबसे ज्यादा हैं, पर इनकी भाषाओं को अहमियत नहीं मिली। लंबे संघर्ष के बाद दोनों भाषाओं को मान्यता मिलना राहत की बात है। हिंदी भाषा अखंडता और एकता को दर्शाती है। सरकार से अपील है कि देवनागरी को भी वैकल्पिक लिपी के रूप में तत्काल मान्यता मिलनी चाहिए।- अग्निशेखर, राष्ट्रीय संयोजक पनुन कश्मीर

जम्मू-कश्मीर में एक ही भाषा और समुदाय को अहमियत दी जाती रही। उर्दू को बहुत कम लोग जानते हैं। इसी वजह से अन्य भाषी लोग रोजगार समेत कई सुविधाओं से वंचित रहते। इस फैसले से समानता का राज होगा। हर व्यक्ति को इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करना चाहिए। - आर के भट्ट, अध्यक्ष यूथ ऑल इंडिया कश्मीरी समाज

देर जरूर हुई लेकिन फैसला ऐतिहासिक और सराहनीय है। कश्मीरी भाषा को जोड़ने से कश्मीरी सभ्यता और धरोहरों का संरक्षण होगा। विविधताओं वाले जम्मू-कश्मीर में केवल उर्दू को अहमियत देने से प्रदेश का बड़ा वर्ग भाषागत परेशानियों से जूझने को मजबूर होता रहा। कश्मीरी, हिंदी और डोगरी को जोड़ने से हर व्यक्ति को लाभ होगा और इस फैसले से हर कोई बहुत प्रसन्न हैं।- किरण वातल, अध्यक्ष विश्व कश्मीरी समाज

जम्मू-कश्मीर में हिंदी भाषा को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए केंद्र का फैसला गर्व की बात है। राष्ट्रीय भाषा को प्रदेश में आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलने से हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा। लोगों में हिंदी को लेकर बनी छवी में बदलाव होगा और हिंदी जन-जन के साथ कामकाज की भाषा बन जाएगी। इस फैसले से शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव होगा। हिंदी में रोजगार का अवसर होने से अभिभावक बच्चों को हिंदी पढ़ाएंगे। हिंदी का कार्यक्षेत्र बढ़ेगा। हालांकि पांच भाषाओं के बीच हिंदी को चुनौतियां का सामना भी करना पड़ेगा।- शीतल बनाथिया, अध्यापिका

हिंदी को लेकर सोच में बदलाव होगा। हिंदी में उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के लिए यह फैसला उनके सपनों को पंख लगाने जैसा है। छात्रों में भविष्य को लेकर नई उम्मीद जागी है। हिंदी को लेकर हीन भावना दूर होगी। अभिभावक भी अपने बच्चों को हिंदी पढ़ने को प्रेरित करेंगे। प्रदेश में बेरोजगारी बड़ी समस्या है, जिसे भाषाओं के विस्तार से दूर करने में मदद मिलेगी। सरकारी कार्यालयों में हिंदी उर्दू और अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व भी कम होगा। - लक्ष्मी देवी, पीएचडी शोधार्थी, जम्मू यूनिवर्सिट

हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने से अब हिंदी उपेक्षा नहीं होगी। इससे हिंदी को लेकर हमारी सोच में भी बदलाव होगा और हिंदी जन-जन की भाषा होगी। हिंदी के आधिकारिक भाषा बनने से शिक्षा में हिंदी को बढ़ावा मिलेगा। प्रदेश में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए जमीनी सतर पर काम होगा। कार्यालयों में हिंदी भाषा का उपयोग होने से आम आदमी को लाभ होगा। - डॉ. वंदना शर्मा, व्याख्याता हिंदी

आधिकारिक भाषा बनने से ही डोगरी को सही स्थान मिलेगा। 12 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 2003 में डोगरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया था। अब यह देखना होगा कि क्या डोगरी भाषा को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाता है या नहीं। सरकारी पत्र व्यवहार में उपयोग पर ही यह निर्भर करेगा। आठवीं अनुसूचित में शामिल होकर बुनियादी बनी थी, अब नए फैसले से डोगरी को उसका उचित स्थान मिलेगा। - प्रो. ललित मंगोत्रा, डोगरी संस्था के अध्यक्ष

महाराजा रणबीर सिंह के समय में डोगरी सरकारी भाषा थी, लेकिन इसके बाद उपेक्षा से डोगरी का दायरा सीमित कर दिया गया। आठवीं अनुसूचि में शामिल कराने के लिए वर्ष 1992 में डोगरी संघर्ष मोर्चा का गठन किया था। 12 वर्षों बाद कामयाबी मिली। सरकारी स्तर पर डोगरी बोलने और लिखने का विकल्प मिलना इस प्रचलित भाषा को सही स्थान दिलाएगा। इससे सरकारी कामकाज में और पारदर्शिता आएगी। - एडवोकेट हरि चंद जलमेरिया, डोगरी संघर्ष मोर्चा के सचिव

मातृ भाषा डोगरी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलना गर्व का विषय होगा। मातृ भाषा में समझना और लिखना आसान होता है। जम्मू, कठुआ, उधमपुर सहित अन्य जिलों में बड़ी आबादी डोगरी भाषी है। सरकारी कार्यालयों में उपयोग होने से लोग इससे जुड़ेंगे। उर्दू का ज्ञान न होने से अदालतों से लेकर दफ्तरों में आम आदमी खुद को असहाय महसूस करता था। अब डोगरी से नई पीढ़ी भी जुड़ेगी। -गुलचैन सिंह चाढ़क, अध्यक्ष डोगरा सदर सभा


कहा जा सकता है कि अब डोगरी की अनदेखी नहीं होगी। पूर्व में डोगरी भाषा को लेकर सरकार का रवैया नकारात्मक रहा है। अन्य भाषाओं की तुलना में डोगरी को नजरंदाज किया जाता रहा। इस फैसले से नए द्वार खुलेंगे। डोगरी, कश्मीरी और हिंदी को ही आधिकारिक भाषा बनाया जाता तो और अच्छा होता। फिर भी उम्मीद है कि शिक्षा संस्थानों से लेकर अन्य संस्थाओं में डोगरी का गर्व से उपयोग किया जाएगा, जिससे भाषा का विस्तार होगा। - मोहन सिंह, वरिष्ठ लेखक

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