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'विधायकों के लिए खुला खजाना, वर्कर्स के लिए फंड नहीं'
Updated Fri, 30 Mar 2018 01:59 AM IST
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कठुआ। वेतन बढ़ोतरी की मांग कर रहीं आंगनबाड़ी वर्करों व हेल्परों ने वीरवार को रोष रैली के दौरान राज्य सरकार पर जमकर हल्ला बोला। उन्होंने कालेज मार्ग जाम कर जिला सचिवालय के सामने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी वर्करों और हेल्परों ने कहा कि राज्य सरकार के पास विधायकों का वेतन बढ़ाने के लिए फंड की कभी नहीं रहती है, लेकिन आम लोगों और कर्मचारियों के लिए वह हमेशा खजाना खाली होने का नाटक करती है।
सरकार पर भड़कीं आंगनबाड़ी वर्कर-हेल्पर यूनियन के सदस्यों ने कहा कि सरकार कर्मचारी विरोधी है। यहां तक कि जिन लोगों को कर्मचारी विधायक बनाकर विधानसभा में भेजते हैं, वे भी चुनाव जीतने के बाद कभी कर्मचारियों की तकलीफ सुनने नहीं आते हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 18 दिन से वह अपने हक के लिए संघर्ष कर रही हैं, लेकिन न तो विभाग का कोई अधिकारी और न ही सरकार का कोई नुमाइंदा उनकी मांग सुनने के लिए आया है।
फिर दिखाया मंत्रियों, विधायकों को आइना
रैली निकाल कर प्रदर्शन कर रहीं आंगनबाड़ी वर्कर्स ने कहा कि हम दिन-रात एक कर राज्य के विकास के लिए अपना खून पसीना लगाते हैं और हम ही तकलीफ उठा रहे हैं, जबकि विधानसभा में बैठने वाले हमारे नेता मौज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय एक आंगनबाड़ी वर्कर को केंद्र सरकार 3000 और राज्य सरकार 600 रुपये देती है। राज्य सरकार को शर्म आनी चाहिए। सरकार के मंत्री या विधायक 600 रुपये में अपना घर चलाकर दिखाएं। उन्होंने कहा कि वे अपने काम को पूरी इमानदारी और निष्ठा से करती हैं, लेकिन उनके साथ इतनी बड़ी नाइंसाफी हो रही है। यह महज भेदभाव का मसला नहीं है, यह संवेदनहीनता है। उन्होंने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि आखिर यह कैसे होता है कि एक व्यक्ति विधायक बनने पर करोड़ पति या अरब पति हो जाता है, जबकि एक आंगनबाड़ी वर्कर को दिन-रात काम करने पर भी राज्य सरकार महज 600 रुपये देती है। यह कहां का इंसाफ है।
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बेटियां सड़कों पर, फिर कैसे होगा महिला सशक्तीकरण
वर्कर्स ने कहा कि सरकार का महिला सशक्तीकरण और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा महज जुमला भर रह गया है। यदि वाकई सरकार इसके प्रति इमानदार होती तो हमारी जैसी महिलाओं और बेटियों को सड़कों पर उतरने के लिए नहीं मजबूर होना पड़ता। उन्होंने कहा कि अब उन्हें समझ में आ रहा है कि बिना संघर्ष के सरकार के कानों तक आवाज नहीं पहुंचने वाली है। इसलिए वे अपना हक लिए बिना पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी वर्करों से वोट बनाने, आधार कार्ड, सर्वे, बूथ स्तर अधिकारी और न जाने कितने ही काम उनसे लिए जाते हैं और बदले में उन्हें केंद्र और राज्य सरकार मिलकर महज 3600 रुपये देती हैं। यह इमानदार वर्कर्स के साथ सरकार नाइंसाफी है। इसके खिलाफ उनका संघर्ष जारी रहेगा।
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सरकार पर भड़कीं आंगनबाड़ी वर्कर-हेल्पर यूनियन के सदस्यों ने कहा कि सरकार कर्मचारी विरोधी है। यहां तक कि जिन लोगों को कर्मचारी विधायक बनाकर विधानसभा में भेजते हैं, वे भी चुनाव जीतने के बाद कभी कर्मचारियों की तकलीफ सुनने नहीं आते हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 18 दिन से वह अपने हक के लिए संघर्ष कर रही हैं, लेकिन न तो विभाग का कोई अधिकारी और न ही सरकार का कोई नुमाइंदा उनकी मांग सुनने के लिए आया है।
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रैली निकाल कर प्रदर्शन कर रहीं आंगनबाड़ी वर्कर्स ने कहा कि हम दिन-रात एक कर राज्य के विकास के लिए अपना खून पसीना लगाते हैं और हम ही तकलीफ उठा रहे हैं, जबकि विधानसभा में बैठने वाले हमारे नेता मौज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय एक आंगनबाड़ी वर्कर को केंद्र सरकार 3000 और राज्य सरकार 600 रुपये देती है। राज्य सरकार को शर्म आनी चाहिए। सरकार के मंत्री या विधायक 600 रुपये में अपना घर चलाकर दिखाएं। उन्होंने कहा कि वे अपने काम को पूरी इमानदारी और निष्ठा से करती हैं, लेकिन उनके साथ इतनी बड़ी नाइंसाफी हो रही है। यह महज भेदभाव का मसला नहीं है, यह संवेदनहीनता है। उन्होंने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि आखिर यह कैसे होता है कि एक व्यक्ति विधायक बनने पर करोड़ पति या अरब पति हो जाता है, जबकि एक आंगनबाड़ी वर्कर को दिन-रात काम करने पर भी राज्य सरकार महज 600 रुपये देती है। यह कहां का इंसाफ है।
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वर्कर्स ने कहा कि सरकार का महिला सशक्तीकरण और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा महज जुमला भर रह गया है। यदि वाकई सरकार इसके प्रति इमानदार होती तो हमारी जैसी महिलाओं और बेटियों को सड़कों पर उतरने के लिए नहीं मजबूर होना पड़ता। उन्होंने कहा कि अब उन्हें समझ में आ रहा है कि बिना संघर्ष के सरकार के कानों तक आवाज नहीं पहुंचने वाली है। इसलिए वे अपना हक लिए बिना पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी वर्करों से वोट बनाने, आधार कार्ड, सर्वे, बूथ स्तर अधिकारी और न जाने कितने ही काम उनसे लिए जाते हैं और बदले में उन्हें केंद्र और राज्य सरकार मिलकर महज 3600 रुपये देती हैं। यह इमानदार वर्कर्स के साथ सरकार नाइंसाफी है। इसके खिलाफ उनका संघर्ष जारी रहेगा।