लेह: लद्दाख के संरक्षित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के हक तय होंगे, एलजी ने दिया दो महीने का अल्टीमेटम
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के तीन प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों और दावों का दो महीने में निपटारा किया जाएगा।
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लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने स्थानीय समुदायों के लंबे समय से लंबित अधिकारों और दावों के निपटारे को दो महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए हैं। यह प्रक्रिया हेमिस नेशनल पार्क, चांगथांग वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कराकोरम वाइल्डलाइफ सेंचुरी में लागू होगी।
सीमाओं के निर्धारण से पहले होगी जनसुनवाई
यह फैसला शुक्रवार को स्टेट बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (एसबीडब्ल्यूएएल) की 16वीं बैठक में लिया गया। बोर्ड ने संबंधित उपायुक्तों और सेटलमेंट अधिकारियों को जनसुनवाई दोबारा शुरू कर दो महीने में प्रक्रिया पूरी करने को कहा है।
स्थानीय बस्तियों और पारंपरिक अधिकारों पर जोर
बैठक में सामने आया कि इन संरक्षित क्षेत्रों में लंबे समय से मानव बस्तियां और स्थानीय समुदाय रहते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बस्तियां वन्यजीव अभयारण्यों के दायरे से बाहर हैं, लेकिन पिछली प्रक्रिया में उन्हें भी शामिल कर लिया गया था। अब लोगों को अपनी जमीन के दस्तावेज और चरागाहों समेत पारंपरिक अधिकारों से जुड़े दावे पेश करने को कहा गया है।
1987 की अधिसूचना पर भी उठे सवाल
बोर्ड ने पाया कि 1987 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से जारी प्रारंभिक अधिसूचना में संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं का जमीनी स्तर पर सही तरीके से सीमांकन नहीं किया गया था। एलजी ने कहा कि अधिकारों के निपटारे की वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए बिना सीमाएं तय करने की कवायद कानून के अनुरूप नहीं थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलू पर भी रहेगा ध्यान
बोर्ड ने यह भी कहा कि कुछ इलाके रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए संरक्षित क्षेत्रों की सीमाएं तय करते समय रक्षा संबंधी आवश्यकताओं और सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों में दर्शाई गई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।
23 अहम परियोजनाओं को मिली मंजूरी की दिशा में बढ़त
बैठक में 23 महत्वपूर्ण परियोजनाओं को भी मंजूरी दी गई और उन्हें राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के पास भेजा गया।