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हमें नई तकनीक आयात करने के बजाय खुद नए आविष्कार करने चाहिएं : उपराज्यपाल
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श्रीनगर। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बुधवार को श्रीनगर में क्वाटरनरी हेल्थकेयर एंड रिसर्च समिट को संबोधित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह समिट जम्मू-कश्मीर और भारत की हेल्थकेयर यात्रा में एक अहम मोड़ है, जहां केंद्र शासित प्रदेश और देश को टर्शियरी केयर से आगे बढ़कर क्वाटरनरी-लेवल के इलाज और रिसर्च को अपनाना होगा ताकि सभी नागरिकों को समान सुविधा मिल सके।
2020 में बैक टू विलेज कार्यक्रम के दौरान अखनूर के अपने दौरे को याद करते हुए उपराज्यपाल ने डॉक्टरों के साथ हुई एक मार्मिक बातचीत का जिक्र किया। इसमें दुर्लभ बीमारियों के निदान और आधुनिक उपकरणों की जरूरत पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा कि इस पल ने दिखाया कि केंद्र शासित प्रदेश में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती छोटे जिला अस्पतालों में उपलब्ध हेल्थकेयर और असल में जरूरी हेल्थकेयर के बीच का अंतर है। इस अंतर को कम करना राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की शानदार प्रगति पर उन्होंने कहा कि 56 करोड़ से ज्यादा नागरिकों का मुफ्त इलाज अमेरिका, फ्रांस, इटली और यूके की कुल आबादी से भी ज्यादा है। देश में सालाना टीकाकरण अभियान में 7 करोड़ बच्चों को कवर करते हैं जो यूके की आबादी के बराबर है। ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन सालाना 37 करोड़ लोगों को सुविधा देती है, जो अमेरिका की आबादी से भी ज्यादा है। 23 एम्स और 2,045 मेडिकल कॉलेजों के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और जम्मू-कश्मीर में 2 एम्स, 10 मेडिकल कॉलेज, 2 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट, एक बोन एंड जॉइंट हॉस्पिटल, एक पीडियाट्रिक हॉस्पिटल, 52 नर्सिंग कॉलेज, 23 पैरामेडिकल कॉलेज और 5 फार्मेसी कॉलेज हेल्थकेयर सिस्टम को मजबूत सहारा दे रहे हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शियरी केयर को बेहतर बनाने में सफल रहा है लेकिन अब समय आ गया है कि टर्शियरी अस्पतालों को क्वार्टरनरी सेंटर्स के तौर पर अपग्रेड किया जाए।
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क्वाटरनरी केयर (सबसे ऊंचे स्तर की चिकित्सा सेवा) समाज के सिर्फ अमीर वर्ग के लिए ही नहीं होनी चाहिए। यह नागरिकता का अधिकार और देश की गारंटी होनी चाहिए। लंबे समय से क्वाटरनरी केयर को एक ऐसी सुविधा माना जाता रहा है जो सिर्फ बड़े शहरों में मिलती है और जिसका फायदा सिर्फ वही लोग उठा सकते हैं जो इसका खर्च उठा सकते हैं। मैं इस मंच से साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि अब यह दौर खत्म होना चाहिए। इस संकल्प को पूरा करने के लिए सभी संबंधित पक्षों, प्राइवेट अस्पतालों और रिसर्च सेंटरों का सहयोग जरूरी है। इस मौके पर उप-राज्यपाल ने समिट की स्मारिका और कई प्रकाशन जारी किए।
खुद को रिसर्च संस्थानों में बदलें अस्पताल
उपराज्यपाल ने अस्पतालों से खुद को ऐसे रिसर्च संस्थानों में बदलने का आह्वान किया जो ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन, रोबोटिक और प्रिसिजन सर्जरी, एडवांस्ड जीनोमिक्स, सेलुलर थेरेपी और एआई-सपोर्टेड डायग्नोस्टिक्स करने में सक्षम हों। उन्होंने कहा, हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि एक क्वाटरनरी सेंटर विज्ञान द्वारा स्वीकृत हर तरह की जांच और इलाज करने में सक्षम होना चाहिए। इसलिए अस्पतालों को रोबोटिक सर्जरी, जीन थेरेपी, प्रोटॉन-बीम थेरेपी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स जैसी महंगी और मॉडर्न टेक्नोलॉजी के लिए भी बजट का इंतजाम करना होगा। सालाना बजट तैयार करते समय अस्पतालों को हर साल खास इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड तय करना चाहिए। इससे वे धीरे-धीरे नाज़ुक और जटिल प्रक्रियाओं के लिए मॉडर्न ऑपरेटिंग थिएटर जैसी सुविधाएं विकसित कर सकेंगे।
क्वाटरनरी-केयर संस्थानों से जोड़ने के लिए कॉरिडोर बनाने का भी सुझाव
उपराज्यपाल ने जिला अस्पतालों और टर्शियरी सेंटरों को सीधे क्वाटरनरी-केयर संस्थानों से जोड़ने के लिए एक नया कॉरिडोर बनाने का भी सुझाव दिया। इससे डायग्नोस्टिक्स, इमेजिंग और स्पेशलिस्ट से सलाह लेने की प्रक्रिया तेज हो सके। उन्होंने कहा कि टेलीमेडिसिन और एआई-सक्षम डायग्नोस्टिक टूल्स को स्टैंडर्ड हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल किया जाना चाहिए। उपराज्यपाल ने ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन, ऑन्कोलॉजी, जीनोमिक्स और क्रिटिकल केयर में फेलोशिप और ट्रेनिंग के मौकों को बढ़ाने की अपील की। उपराज्यपाल ने एक ऐसे मिशन का भी सुझाव दिया जो हिमालयी राज्यों, जम्मू-कश्मीर, यूनिवर्सिटीज, अस्पतालों, प्राइवेट संस्थानों और इनोवेटर्स को एक साथ लाए ताकि बायोमेडिकल रिसर्च को आगे बढ़ाया जा सके और फंडिंग की चुनौतियों से निपटा जा सके।
अस्पतालों को रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाए
उपराज्यपाल ने आग्रह किया कि अस्पतालों को हाईवे और बंदरगाहों की तरह ही रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाए और पूरी लगन के साथ उनके संरक्षण और विकास को सुनिश्चित किया जाए। हमें एक मजबूत ''''क्वाटरनरी-केयर'''' (अत्यधिक विशिष्ट चिकित्सा सेवा) ढांचा तैयार करना होगा जो यह पक्का करे कि किसान के बेटे और शहर में रहने वाले करोड़पति, दोनों को समान रूप से यह सुविधा मिल सके। यह काम आसान नहीं होगा लेकिन इसे राष्ट्रीय समर्पण और सेवा की भावना से किया जाना चाहिए। आइए, इस समिट में मिलकर एक ऐसी रणनीति तैयार करें जो इन लक्ष्यों को सटीक और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए याद रखी जाए। हमें विदेशों से इनोवेशन मंगाने के बजाय खुद नए आविष्कार करने चाहिएं।
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2020 में बैक टू विलेज कार्यक्रम के दौरान अखनूर के अपने दौरे को याद करते हुए उपराज्यपाल ने डॉक्टरों के साथ हुई एक मार्मिक बातचीत का जिक्र किया। इसमें दुर्लभ बीमारियों के निदान और आधुनिक उपकरणों की जरूरत पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा कि इस पल ने दिखाया कि केंद्र शासित प्रदेश में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती छोटे जिला अस्पतालों में उपलब्ध हेल्थकेयर और असल में जरूरी हेल्थकेयर के बीच का अंतर है। इस अंतर को कम करना राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की शानदार प्रगति पर उन्होंने कहा कि 56 करोड़ से ज्यादा नागरिकों का मुफ्त इलाज अमेरिका, फ्रांस, इटली और यूके की कुल आबादी से भी ज्यादा है। देश में सालाना टीकाकरण अभियान में 7 करोड़ बच्चों को कवर करते हैं जो यूके की आबादी के बराबर है। ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन सालाना 37 करोड़ लोगों को सुविधा देती है, जो अमेरिका की आबादी से भी ज्यादा है। 23 एम्स और 2,045 मेडिकल कॉलेजों के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और जम्मू-कश्मीर में 2 एम्स, 10 मेडिकल कॉलेज, 2 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट, एक बोन एंड जॉइंट हॉस्पिटल, एक पीडियाट्रिक हॉस्पिटल, 52 नर्सिंग कॉलेज, 23 पैरामेडिकल कॉलेज और 5 फार्मेसी कॉलेज हेल्थकेयर सिस्टम को मजबूत सहारा दे रहे हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शियरी केयर को बेहतर बनाने में सफल रहा है लेकिन अब समय आ गया है कि टर्शियरी अस्पतालों को क्वार्टरनरी सेंटर्स के तौर पर अपग्रेड किया जाए।
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क्वाटरनरी केयर (सबसे ऊंचे स्तर की चिकित्सा सेवा) समाज के सिर्फ अमीर वर्ग के लिए ही नहीं होनी चाहिए। यह नागरिकता का अधिकार और देश की गारंटी होनी चाहिए। लंबे समय से क्वाटरनरी केयर को एक ऐसी सुविधा माना जाता रहा है जो सिर्फ बड़े शहरों में मिलती है और जिसका फायदा सिर्फ वही लोग उठा सकते हैं जो इसका खर्च उठा सकते हैं। मैं इस मंच से साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि अब यह दौर खत्म होना चाहिए। इस संकल्प को पूरा करने के लिए सभी संबंधित पक्षों, प्राइवेट अस्पतालों और रिसर्च सेंटरों का सहयोग जरूरी है। इस मौके पर उप-राज्यपाल ने समिट की स्मारिका और कई प्रकाशन जारी किए।
खुद को रिसर्च संस्थानों में बदलें अस्पताल
उपराज्यपाल ने अस्पतालों से खुद को ऐसे रिसर्च संस्थानों में बदलने का आह्वान किया जो ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन, रोबोटिक और प्रिसिजन सर्जरी, एडवांस्ड जीनोमिक्स, सेलुलर थेरेपी और एआई-सपोर्टेड डायग्नोस्टिक्स करने में सक्षम हों। उन्होंने कहा, हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि एक क्वाटरनरी सेंटर विज्ञान द्वारा स्वीकृत हर तरह की जांच और इलाज करने में सक्षम होना चाहिए। इसलिए अस्पतालों को रोबोटिक सर्जरी, जीन थेरेपी, प्रोटॉन-बीम थेरेपी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स जैसी महंगी और मॉडर्न टेक्नोलॉजी के लिए भी बजट का इंतजाम करना होगा। सालाना बजट तैयार करते समय अस्पतालों को हर साल खास इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड तय करना चाहिए। इससे वे धीरे-धीरे नाज़ुक और जटिल प्रक्रियाओं के लिए मॉडर्न ऑपरेटिंग थिएटर जैसी सुविधाएं विकसित कर सकेंगे।
क्वाटरनरी-केयर संस्थानों से जोड़ने के लिए कॉरिडोर बनाने का भी सुझाव
उपराज्यपाल ने जिला अस्पतालों और टर्शियरी सेंटरों को सीधे क्वाटरनरी-केयर संस्थानों से जोड़ने के लिए एक नया कॉरिडोर बनाने का भी सुझाव दिया। इससे डायग्नोस्टिक्स, इमेजिंग और स्पेशलिस्ट से सलाह लेने की प्रक्रिया तेज हो सके। उन्होंने कहा कि टेलीमेडिसिन और एआई-सक्षम डायग्नोस्टिक टूल्स को स्टैंडर्ड हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल किया जाना चाहिए। उपराज्यपाल ने ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन, ऑन्कोलॉजी, जीनोमिक्स और क्रिटिकल केयर में फेलोशिप और ट्रेनिंग के मौकों को बढ़ाने की अपील की। उपराज्यपाल ने एक ऐसे मिशन का भी सुझाव दिया जो हिमालयी राज्यों, जम्मू-कश्मीर, यूनिवर्सिटीज, अस्पतालों, प्राइवेट संस्थानों और इनोवेटर्स को एक साथ लाए ताकि बायोमेडिकल रिसर्च को आगे बढ़ाया जा सके और फंडिंग की चुनौतियों से निपटा जा सके।
अस्पतालों को रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाए
उपराज्यपाल ने आग्रह किया कि अस्पतालों को हाईवे और बंदरगाहों की तरह ही रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाए और पूरी लगन के साथ उनके संरक्षण और विकास को सुनिश्चित किया जाए। हमें एक मजबूत ''''क्वाटरनरी-केयर'''' (अत्यधिक विशिष्ट चिकित्सा सेवा) ढांचा तैयार करना होगा जो यह पक्का करे कि किसान के बेटे और शहर में रहने वाले करोड़पति, दोनों को समान रूप से यह सुविधा मिल सके। यह काम आसान नहीं होगा लेकिन इसे राष्ट्रीय समर्पण और सेवा की भावना से किया जाना चाहिए। आइए, इस समिट में मिलकर एक ऐसी रणनीति तैयार करें जो इन लक्ष्यों को सटीक और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए याद रखी जाए। हमें विदेशों से इनोवेशन मंगाने के बजाय खुद नए आविष्कार करने चाहिएं।