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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Srinagar News ›   For the first time, the army's animal contingent will be seen on duty, including two-humped camels.

गणतंत्र दिवस 2026: कर्तव्य पथ पर पहली बार दिखेगा सेना का पशु दस्ता, दो कूबड़ वाले ऊंट भी होंगे शामिल

Wed, 07 Jan 2026 01:03 PM IST
निकिता गुप्ता अमर उजाला नेटवर्क, लेह
अमर उजाला नेटवर्क, लेह Published by: निकिता गुप्ता Updated Wed, 07 Jan 2026 01:03 PM IST
सार

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर पहली बार कर्तव्य पथ पर भारतीय सेना का विशेष पशु दस्ता मार्च पास्ट करेगा, जिसमें दो कूबड़ वाले ऊंट, चार शिकारी पक्षी और भारतीय नस्ल के कुत्ते शामिल होंगे।

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For the first time, the army's animal contingent will be seen on duty, including two-humped camels.
नई दिल्ली में कर्तव्य पथ पर मार्च पास्ट करने के लिए अभ्यास करता सेना का पशु दस्ता। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

26 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह एक ऐतिहासिक पल का साक्षी बनेगा। देश के सैन्य इतिहास में पहली बार भारतीय सेना का एक विशेष पशु दस्ता राष्ट्रीय राजधानी के कर्तव्य पथ पर मार्च पास्ट करेगा। ये पशु दस्ता देश के सबसे दुर्गम और कठिन इलाकों में सैन्य अभियानों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करेगा। इस दस्ते का मुख्य आकर्षण पूर्वी लद्दाख के दुर्गम क्षेत्रों में तैनात दो कूबड़ वाले दो बैक्ट्रियन ऊंट रहेंगे।

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दो ऊंटों के अलावा पशु दस्ते में सेना के चार शिकारी पक्षी, भारतीय नस्ल के 10 कुत्ते और वर्तमान में सेवा में तैनात छह पारंपरिक सैन्य कुत्ते भी शामिल होंगे। चार जंस्कारी टट्टू भी मार्च पास्ट करेंगे। ये लद्दाख की एक अन्य स्वदेशी नस्ल हैं जो पहाड़ी क्षेत्र में मजबूत सहनशक्ति के लिए जानी जाती है।
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इस दस्ते का नेतृत्व दो कूबड़ वाले ऊंट करेंगे। इन्हें वर्ष 2024 में पूर्वी लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में अभियानों के लिए सेना में शामिल किया गया था। ये ऊंट समुद्र तल से 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर ठंडे व ऑक्सीजन की कमी वाले इलाकों में 250 किलोग्राम तक भार ढोने में सक्षम हैं।
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कम पानी और कम चारे में काम करने की इनकी क्षमता इन्हें वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास अंतिम छोर तक रसद पहुंचाने, पेट्रोलिंग और परिवहन के लिए बेहद उपयोगी बनाती है। हवाई निगरानी और ड्रोन निष्क्रिय में प्रशिक्षित हैं शिकारी पक्षी: दस्ते के शिकारी पक्षियों को हवाई निगरानी और ड्रोन निष्क्रिय करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है।

वहीं, स्वदेशी कुत्तों की नस्लों ने विस्फोटक पहचान, ट्रैकिंग, आतंकरोधी अभियानों और आपदा राहत कार्यों में अपनी उत्कृष्ट क्षमता साबित की है। कई कुत्तों को उनकी वीरता के लिए सम्मानित भी किया गया है। सेना के अधिकारियों के अनुसार ये पशु दस्ता देश की सबसे कठिन सीमाओं की रक्षा में धैर्य, बलिदान और अनुकूलन क्षमता का सशक्त प्रतीक है।

सिल्क रोड से सामरिक युद्ध क्षेत्र तक जुड़ा इतिहास
बैक्ट्रियन ऊंटों का इतिहास प्राचीन सिल्क रोड से जुड़ा है। तब ये मध्य एशिया से लद्दाख की नुब्रा घाटी के रास्ते चीन, तिब्बत और दक्षिण एशिया के बीच व्यापार के मुख्य साधन हुआ करते थे। अब ये भारतीय सेना के मूक योद्धा बनकर सीमा पर निगरानी और लॉजिस्टिक्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। गणतंत्र दिवस की परेड में इनकी उपस्थिति न केवल लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित करेगी बल्कि सेना की उस क्षमता को भी दिखाएगी जो प्रकृति की कठिनतम चुनौतियों को अपने पक्ष में मोड़ने का हुनर जानती है। 

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