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80 के ट्रेंड ने कुरेदा कश्मीर का अतीत: जिस दौर की तस्वीरें आज यादें बनकर लौट रहीं, घाटी ने देखी दहशत की शुरुआत

Tue, 15 Sep 2026 11:49 AM IST
Nikita Gupta निकिता गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
निकिता गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर Published by: Nikita Gupta Updated Tue, 15 Sep 2026 11:49 AM IST
सार

80 के दशक की तस्वीरों के ट्रेंड के बीच कश्मीर का आतंक, लक्षित हत्याओं और विस्थापन से जुड़ा दर्दनाक अतीत फिर चर्चा में है। पुराने आतंकी मामलों की दोबारा जांच और कश्मीरी पंडितों को मिल रही नई धमकियों ने तीन दशक पुराने जख्मों को फिर ताजा कर दिया है।

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Amidst the trends of the 80s, that dark truth of Kashmir too.
80 के दशक के ट्रेंड के बीच कश्मीर का वो स्याह सच - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सोशल मीडिया पर इन दिनों 80 के दशक की पुरानी तस्वीरों का ट्रेंड चल रहा है। लोग इंस्टाग्राम, फेसबुक और दूसरे प्लेटफॉर्म पर अपने बचपन, परिवार, पुराने शहर और बीते दिनों की तस्वीरें साझा कर रहे हैं। इन तस्वीरों के जरिए लोग उस दौर की अच्छी यादों को फिर से जी रहे हैं, लेकिन कश्मीर के लिए 80 का दशक सिर्फ पुरानी और खूबसूरत यादों का दौर नहीं था। इसी समय घाटी में आतंकवाद और हिंसा ने लोगों की जिंदगी बदल दी।

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कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर की चर्चा करते समय अक्सर 1987 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में हुई धांधली से पैदा हुए राजनीतिक असंतोष को इसके उभार की प्रमुख वजह माना जाता है। इसके बाद 1989-90 में आतंकवाद ने भयावह रूप ले लिया और कश्मीरी हिंदुओं को निशाना बनाकर की गई हत्याओं से घाटी का सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह प्रभावित हुआ।

1987 के चुनावों में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के प्रदर्शन, उसके उम्मीदवारों पर हुई कार्रवाई और चुनाव में हुई अनियमितताओं को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। इतिहासकारों और विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इन घटनाओं से घाटी के एक बड़े हिस्से में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति भरोसा कमजोर हुआ, जिसका असर आगे चलकर व्यापक रूप में दिखाई दिया। इसके दो साल बाद सितंबर 1989 में श्रीनगर में कश्मीरी पंडित और अधिवक्ता टीका लाल टपलू की हत्या कर दी गई।

नवंबर 1989 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू को भी आतंकियों ने मार डाला। जस्टिस गंजू ने ही आतंकी मकबूल भट को मृत्युदंड सुनाया था। इन लक्षित हत्याओं ने घाटी में डर के माहौल को और गहरा कर दिया। लगातार बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर जम्मू व देश के विभिन्न हिस्सों में चले गए।

बड़े पैमाने पर हुए इस विस्थापन का असर कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर पड़ा, जिसकी चर्चा आज भी होती है। 18 अप्रैल 1990 को स्किम्स श्रीनगर की नर्स सरला भट्ट का अपहरण करने के बाद हत्या कर दी गई। यह मामला इस वर्ष फिर चर्चा में आया जब प्रदेश जांच एजेंसी (एसआईए) ने करीब 36 वर्ष पुराने इस मामले में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। जांच एजेंसी ने हत्या को एक बड़ी आतंकी साजिश का हिस्सा बताया है। हालांकि, आरोपी यासीन ने इसमें संलिप्तता से इन्कार किया है।

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आतंकवाद के पुराने मामलों की जांच और फिर से मिलतीं धमकियां
आतंकी हमलों के पुराने मामलों की जांच के बीच कश्मीरी पंडितों को मिल रही हालिया धमकियों ने पुराने डर और सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है। लश्कर-ए-ताइबा के मुखौटा संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) ने सोशल मीडिया पर पत्र जारी कर कश्मीरी पंडितों और उनके ट्रांजिट आवासों को निशाना बनाने की लगातार धमकियां दी हैं।

ऐसे में आज जब 80 के दशक की तस्वीरें सोशल मीडिया पर लोगों को उनके पुराने दिनों की याद दिला रही हैं तो वहीं कई परिवारों के लिए वह दौर सिर्फ तस्वीरों में कैद अतीत भर नहीं है। यह उनके लिए अपना घर छूटने, अपनों को खोने और लंबे समय तक विस्थापन का दर्द झेलने की कहानी है।

अब तीन दशक से अधिक पुराने मामलों की जांच भी दोबारा आगे बढ़ रही है। अगस्त 2026 में एसआईए ने 1998 के वंधामा नरसंहार की जांच फिर शुरू की। इस घटना में 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई थी। जांच एजेंसी टपलू और न्यायाधीश गंजू समेत कुछ अन्य पुराने मामलों में भी नए सुराग तलाश रही है।

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इतिहास से सबक लेकर बेहतर भविष्य की आस
1987 के चुनाव, 1989-90 की लक्षित हत्याएं और आज दोबारा खुल रहीं पुरानी जांचें, कश्मीर के उस दौर की कई घटनाओं को फिर से सामने ला रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि दशकों पुराने इन मामलों में पीड़ित परिवारों को न्याय कब मिलेगा और उस दौर की घटनाओं से आज क्या सबक लिया जाएगा? मकसद यही है कि आतंकवाद के दौर में जान गंवाने वाले लोगों की कहानियों को समय के साथ भुलाया न जाए, बल्कि इतिहास से सबक लेकर एक बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सके।

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