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सरकार की भांग खेती को मंजूरी करेगी युवा पीढ़ी को बर्बाद : कुंदन शास्त्री
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भांग की खेती का फैसला वापस ले सरकार, वरना बर्बाद हो जाएंगे युवा
हाटी किसान संघ की अपील प्रदेश सरकार जनहित में अपना ये फैसला ले वापस
सरकार के इस फैसले से प्रदेश में आशांति, गांव में अपराध बढ़ेंगे और परिवारों का सुख चैन छीनेगा : कुंदन शास्त्री
संवाद न्यूज एजेंसी
पांवटा साहिब (सिरमौर)। हिमाचल सरकार की ओर से प्रदेश में भांग की खेती को मंजूरी देना युवा पीढ़ी की बर्बादी के लिए एक आसान मार्ग खोलने जैसा गलत निर्णय है। हाटी किसान संघ ने प्रदेश सरकार की ओर से भांग की खेती को मान्यता देने के फैसले पर कड़ा रोष और चिंत्ता जताई है।
हाटी संघ का कहना है कि जो लोग समझते हैं कि किसी नियम कानून के तहत भांग की खेती पर नियंत्रण रखा जाएगा, वो इसके दुरुपयोग, अवैध कारोबार और संभावित खतरे से बिल्कुल अनजान हैं। इसलिए प्रदेश सरकार को समय रहते भांग की खेती को कानूनी मान्यता देने का फैसला वापस लेना चाहिए। हाटी किसान संघ अध्यक्ष कुंदन सिंह शास्त्री ने प्रेस बयान के माध्यम से सरकार से इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग उठाई है।
शास्त्री ने कहा कि सोचने वाली बात तो ये है कि बिना प्रदेश सरकार की मंजूरी के भी हिमाचल में भांग के पौधों से बनाए जाने वाले चरस का कितना बड़ा अवैध कारोबार खड़ा हो चुका है। कोई भी गांव ऐसा नहीं बचा है जहां के युवा चोरी छिपे चरस का सेवन नहीं करते। चरस का अवैध व्यापार करने वाले कितने तो पकड़े जा रहे हैं लेकिन जो नहीं पकड़े जाते उनकी संख्या कितनी होगी? जो लोग अपने खेतों में भांग की खेती करेंगे उनकी भावना अधिक लाभ लेने में ही होगी।
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हाटी किसान संघ का कहना है कि भांग की खेती में बीज से अधिक लाभ भांग से चरस तैयार करने और बेचने से मिलेगा। फिर चाहे वह अवैध रूप से ही क्यों न हो। और जब ये खतरनाक रूप लेकर चरस का अवैध व्यापार का तंत्र खड़ा हो जाएगा तो इसे रोकना कतई आसान नहीं होगा। गांव-गांव में युवा देखा देखी में इस्तेमाल करते हुए इस नशे के आदी बनेंगे। युवाओं को बर्बाद करने वाले स्मैक पर काबू पाना पहले ही काफी कठिन हो रहा है। ऐसे में चरस से हिमाचल की युवा पीढ़ी बर्बादी की ओर जाएगी, गांव में अपराध बढ़ेंगे। अनेक परिवारों का सुख चैन छीनेगा और हमारा सुंदर शांत हिमाचल भी अशांत बनेगा।
संघ अध्यक्ष का कहना है कि प्रदेश के समझदार और दूरदर्शी लोगों को मिलकर आवाज उठानी चाहिए। प्रदेश सरकार को भी भांग की खेती को दी गई कानूनी मान्यता के निर्णय को जनहित में वापस लेना चाहिए।
संवाद
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हाटी किसान संघ की अपील प्रदेश सरकार जनहित में अपना ये फैसला ले वापस
सरकार के इस फैसले से प्रदेश में आशांति, गांव में अपराध बढ़ेंगे और परिवारों का सुख चैन छीनेगा : कुंदन शास्त्री
संवाद न्यूज एजेंसी
पांवटा साहिब (सिरमौर)। हिमाचल सरकार की ओर से प्रदेश में भांग की खेती को मंजूरी देना युवा पीढ़ी की बर्बादी के लिए एक आसान मार्ग खोलने जैसा गलत निर्णय है। हाटी किसान संघ ने प्रदेश सरकार की ओर से भांग की खेती को मान्यता देने के फैसले पर कड़ा रोष और चिंत्ता जताई है।
हाटी संघ का कहना है कि जो लोग समझते हैं कि किसी नियम कानून के तहत भांग की खेती पर नियंत्रण रखा जाएगा, वो इसके दुरुपयोग, अवैध कारोबार और संभावित खतरे से बिल्कुल अनजान हैं। इसलिए प्रदेश सरकार को समय रहते भांग की खेती को कानूनी मान्यता देने का फैसला वापस लेना चाहिए। हाटी किसान संघ अध्यक्ष कुंदन सिंह शास्त्री ने प्रेस बयान के माध्यम से सरकार से इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग उठाई है।
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शास्त्री ने कहा कि सोचने वाली बात तो ये है कि बिना प्रदेश सरकार की मंजूरी के भी हिमाचल में भांग के पौधों से बनाए जाने वाले चरस का कितना बड़ा अवैध कारोबार खड़ा हो चुका है। कोई भी गांव ऐसा नहीं बचा है जहां के युवा चोरी छिपे चरस का सेवन नहीं करते। चरस का अवैध व्यापार करने वाले कितने तो पकड़े जा रहे हैं लेकिन जो नहीं पकड़े जाते उनकी संख्या कितनी होगी? जो लोग अपने खेतों में भांग की खेती करेंगे उनकी भावना अधिक लाभ लेने में ही होगी।
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हाटी किसान संघ का कहना है कि भांग की खेती में बीज से अधिक लाभ भांग से चरस तैयार करने और बेचने से मिलेगा। फिर चाहे वह अवैध रूप से ही क्यों न हो। और जब ये खतरनाक रूप लेकर चरस का अवैध व्यापार का तंत्र खड़ा हो जाएगा तो इसे रोकना कतई आसान नहीं होगा। गांव-गांव में युवा देखा देखी में इस्तेमाल करते हुए इस नशे के आदी बनेंगे। युवाओं को बर्बाद करने वाले स्मैक पर काबू पाना पहले ही काफी कठिन हो रहा है। ऐसे में चरस से हिमाचल की युवा पीढ़ी बर्बादी की ओर जाएगी, गांव में अपराध बढ़ेंगे। अनेक परिवारों का सुख चैन छीनेगा और हमारा सुंदर शांत हिमाचल भी अशांत बनेगा।
संघ अध्यक्ष का कहना है कि प्रदेश के समझदार और दूरदर्शी लोगों को मिलकर आवाज उठानी चाहिए। प्रदेश सरकार को भी भांग की खेती को दी गई कानूनी मान्यता के निर्णय को जनहित में वापस लेना चाहिए।
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