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प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन ऐतिहासिक फैसला : धीरेंद्र चौहान
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प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी, प्रभावी और जनोन्मुखी बनाने में महत्वपूर्ण साबित होगा आयोग का गठन
संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता धीरेंद्र चौहान ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के प्रदेश में प्रशासनिक सुधार आयोग के गठन के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में लंबे समय से प्रशासनिक सुधार आयोग के गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पूर्ववर्ती भाजपा सरकार राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित में उलझी रही और इस दिशा में ठोस कदम उठाने से बचती रही। धीरेंद्र चौहान ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए आम जनता की समस्याओं को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आयोग की सिफारिशों से प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाने में मदद मिलेगी। कांग्रेस प्रवक्ता ने हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1948 में प्रदेश के अस्तित्व में आने के समय यहां केवल चार जिले थे। वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति और शिमला सहित पहाड़ी क्षेत्रों के हिमाचल में शामिल होने से प्रदेश का भौगोलिक और प्रशासनिक विस्तार हुआ। वर्ष 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने तक हिमाचल में 10 जिले बन चुके थे। इसके बाद सितंबर 1972 में ऊना और हमीरपुर को नए जिलों का दर्जा दिया गया। उन्होंने कहा कि ये क्षेत्र वर्ष 1966 में हिमाचल में विलय से पहले तहसीलें हुआ करते थे। धीरेंद्र चौहान ने कहा कि पिछले 54 वर्षों से प्रदेश में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन नहीं हुआ था। वर्तमान परिस्थितियों में कई जिलों का भौगोलिक क्षेत्र काफी विस्तृत है, जिससे प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ पंचायती राज संस्थाओं के सुचारु संचालन में भी चुनौतियां सामने आती हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासनिक सुधार आयोग नए जिलों के गठन तथा ब्लॉकों और तहसीलों के पुनर्गठन को लेकर सकारात्मक सिफारिशें करता है, तो इससे दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। प्रशासनिक इकाइयों का उचित पुनर्गठन होने से सरकारी सेवाएं आम जनता के नजदीक पहुंचेंगी और लोगों को छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूर-दराज के कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। धीरेंद्र चौहान ने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री का यह निर्णय प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता धीरेंद्र चौहान ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के प्रदेश में प्रशासनिक सुधार आयोग के गठन के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में लंबे समय से प्रशासनिक सुधार आयोग के गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पूर्ववर्ती भाजपा सरकार राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित में उलझी रही और इस दिशा में ठोस कदम उठाने से बचती रही। धीरेंद्र चौहान ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए आम जनता की समस्याओं को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आयोग की सिफारिशों से प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाने में मदद मिलेगी। कांग्रेस प्रवक्ता ने हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1948 में प्रदेश के अस्तित्व में आने के समय यहां केवल चार जिले थे। वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति और शिमला सहित पहाड़ी क्षेत्रों के हिमाचल में शामिल होने से प्रदेश का भौगोलिक और प्रशासनिक विस्तार हुआ। वर्ष 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने तक हिमाचल में 10 जिले बन चुके थे। इसके बाद सितंबर 1972 में ऊना और हमीरपुर को नए जिलों का दर्जा दिया गया। उन्होंने कहा कि ये क्षेत्र वर्ष 1966 में हिमाचल में विलय से पहले तहसीलें हुआ करते थे। धीरेंद्र चौहान ने कहा कि पिछले 54 वर्षों से प्रदेश में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन नहीं हुआ था। वर्तमान परिस्थितियों में कई जिलों का भौगोलिक क्षेत्र काफी विस्तृत है, जिससे प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ पंचायती राज संस्थाओं के सुचारु संचालन में भी चुनौतियां सामने आती हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासनिक सुधार आयोग नए जिलों के गठन तथा ब्लॉकों और तहसीलों के पुनर्गठन को लेकर सकारात्मक सिफारिशें करता है, तो इससे दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। प्रशासनिक इकाइयों का उचित पुनर्गठन होने से सरकारी सेवाएं आम जनता के नजदीक पहुंचेंगी और लोगों को छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूर-दराज के कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। धीरेंद्र चौहान ने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री का यह निर्णय प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।