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परंपरा और लोकरंग से जुड़ी है दिवाली
Mandi
Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
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मंडी। दीपों का त्योहार दिवाली ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी परंपरा और लोकरंग में डूबा हुआ है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले इस त्योहार को मंडी जनपद में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आधुनिकता की चकाचौंध के बावजूद ग्रामीण अंचलों में दिवाली अपने परंपरागत अंदाज में मनाई जाती है। इसमें ग्रामीण समाज के लोक जीवन की झलक देखने को मिलती है। धन धान्य की देवी लक्ष्मी के आह्वान के अलावा लोक देवी देवताओं की आराधना भी इस पर्व के दौरान की जाती है। कहीं मेले तो कहीं लोकनाट्य बांठड़ा के स्वांग जनमानस की कुंठाओं को दूर करते हैं। वहीं पर खेत खलिहानों में घास के गट्ठरों को जलाकर दिवाली का आह्वान करते बच्चे इस त्योहार के एक सप्ताह पूर्व ही मस्ती में डूब जाते हैं। मंडी शहर में दिवाली को सिद्धकाली मंदिर के बाहर विशेष चौकी में पूजा अर्चना करने की परंपरा आज भी कायम है। मंडी जनपद के प्राचीन गांव मलवाणा की दिवाली आज भी परंपराओं से जुड़ी है। दिवाली से एक दिन पूर्व ग्राम देवी भगवती मसवाई के मंदिर में जाग का आयोजन होता है तो दिवाली को नागधार स्थित मंदिर में मेले का आयोजन होता है। इसी दिन राजतंत्र के जमाने से मशहूर लोकनाट्य बांठड़ा के मंचन की परंपरा भी इस गांव में कायम है। दिवाली को खेतों में घुरसू फेरने और अलाव पूजन की परंपरा इस बात का भी परिचायक है कि सर्दियों के मौसम में भीषण ठंड के बावजूद आग ही मनुष्य का एकमात्र सहारा होती है। दिवाली की रात तांत्रिक अनुष्ठान आदि करने की परंपरा भी ग्रामीण क्षेत्रों में है। इस दौरान भादो महीने में जिस किसी भी बुरी आत्माओं का साया पड़ता है तो उसकी छाडपटड़ी दिवाली की रात की जाती है। दिवाली को ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाने की परंपरा है।
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