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जान हथेली पर रखकर खतरनाक मोर्गो पर सफर करने को विवश लोग
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करसोग (मंडी)। प्रदेश में हर साल लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों से हजारों घरों के चिराग बुझे गए हैं। कई लोग इन भयावह हादसों में बच गए हैं और कई आज भी बैसाखियों के सहारे जिंदगी काट रहे हैं। अगर दुर्गम उपमंडल करसोग की बात करें तो यहां लोग आजादी के सात दशक बाद भी जान हथेली पर रखकर संकरी और खतरनाक सड़कों पर सफर करने को मजबूर हैं।
हालत यह है कि अधिकतर सड़कों में न तो क्रैश बैरियर हैं और न ही पैरापिट लगाए गए हैं। जिन एमडीआर (मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड) में पैरापिट लगाए हैं, उनकी हालत भी खराब है। ऐसे में लोनिवि डिविजन करसोग के तहत सड़कों पर सफर के दौरान लोगों की जान राम भरोसे है। करसोग लोनिवि डिविजन के अधिशासी अभियंता मान सिंह का कहना है कि एमडीआर में क्रैश बैरियर लगाए जाएंगे। इसके अतिरिक्त पीएमजीएसवाई के तहत बनीं सड़कों में भी सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए जाएंगे।
प्रधानमंत्री योजना के तहत बनीं सड़कें बेहद खस्ता
करसोग में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत अब तक कुल 52 सड़कों का निर्माण किया गया है। इनकी लंबाई 350 किलोमीटर से अधिक है। इसमें कई सड़कों में तो फेज टू के तहत कार्य चल रहा है, लेकिन पीएमजीएसवाई के तहत बनी एक भी सड़क में क्रैश बैरियर नहीं लगाए गए हैं।
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करसोग में एमडीआर के तहत करीब दो सड़कें हैं। इन दोनों ही सड़कों की लंबाई करीब 104 किलोमीटर है। इसमें तत्तापानी से राकनी तक 62.750 किलोमीटर सड़क करसोग डिविजन के तहत है। इसी तरह से बखरोट से लुहरी तक 41.800 किलोमीटर सड़क की देखरेख का जिम्मा भी करसोग पीडब्ल्यूडी डिविजन का ही है। इन दोनों ही सड़कों पर पीडब्ल्यूडी ने केवल 10 ऐसी जगहों पर क्रैश बैरियर लगाए हैं, जहां दुर्घटना घट चुकी है। इन क्रैश बैरियरों की लंबाई भी मुश्किल से 4 किलोमीटर के करीब होगी। इसके अतिरिक्त बाकी 100 किलोमीटर सड़क पर क्रैश बैरियर लगाने के लिए पीडब्ल्यूडी को शायद दुर्घटना घटने का इंतजार है।
19 साल पहले शुरू हुई थी योजना
भारत सरकार ने 25 दिसंबर 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का मुख्य मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में 500 या इससे अधिक आबादी वाले (पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में 250 लोगों की आबादी वाले गांव) सड़क-संपर्क से वंचित गांवों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय से ही इसका नाम प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना है। फेज वन में सीधे में सड़क की चौड़ाई 5 मीटर और मोड़ पर यही चौड़ाई 7 मीटर होनी चाहिए। दुर्घटना को रोकने के लिए सड़क के किनारे निर्माण के दौरान ही पैरापिट लगाना भी जरूरी है। सड़क की गुणवत्ता जांचने के लिए बाकायदा नेशनल क्वालिटी मॉनिटर (एनक्यूएम) की टीम होती है, जिसमें दूसरे राज्य से चीफ इंजीनियर या फिर रिटायर्ड ईएनसी स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं।
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हालत यह है कि अधिकतर सड़कों में न तो क्रैश बैरियर हैं और न ही पैरापिट लगाए गए हैं। जिन एमडीआर (मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड) में पैरापिट लगाए हैं, उनकी हालत भी खराब है। ऐसे में लोनिवि डिविजन करसोग के तहत सड़कों पर सफर के दौरान लोगों की जान राम भरोसे है। करसोग लोनिवि डिविजन के अधिशासी अभियंता मान सिंह का कहना है कि एमडीआर में क्रैश बैरियर लगाए जाएंगे। इसके अतिरिक्त पीएमजीएसवाई के तहत बनीं सड़कों में भी सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए जाएंगे।
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प्रधानमंत्री योजना के तहत बनीं सड़कें बेहद खस्ता
करसोग में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत अब तक कुल 52 सड़कों का निर्माण किया गया है। इनकी लंबाई 350 किलोमीटर से अधिक है। इसमें कई सड़कों में तो फेज टू के तहत कार्य चल रहा है, लेकिन पीएमजीएसवाई के तहत बनी एक भी सड़क में क्रैश बैरियर नहीं लगाए गए हैं।
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करसोग में एमडीआर के तहत करीब दो सड़कें हैं। इन दोनों ही सड़कों की लंबाई करीब 104 किलोमीटर है। इसमें तत्तापानी से राकनी तक 62.750 किलोमीटर सड़क करसोग डिविजन के तहत है। इसी तरह से बखरोट से लुहरी तक 41.800 किलोमीटर सड़क की देखरेख का जिम्मा भी करसोग पीडब्ल्यूडी डिविजन का ही है। इन दोनों ही सड़कों पर पीडब्ल्यूडी ने केवल 10 ऐसी जगहों पर क्रैश बैरियर लगाए हैं, जहां दुर्घटना घट चुकी है। इन क्रैश बैरियरों की लंबाई भी मुश्किल से 4 किलोमीटर के करीब होगी। इसके अतिरिक्त बाकी 100 किलोमीटर सड़क पर क्रैश बैरियर लगाने के लिए पीडब्ल्यूडी को शायद दुर्घटना घटने का इंतजार है।
19 साल पहले शुरू हुई थी योजना
भारत सरकार ने 25 दिसंबर 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का मुख्य मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में 500 या इससे अधिक आबादी वाले (पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में 250 लोगों की आबादी वाले गांव) सड़क-संपर्क से वंचित गांवों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय से ही इसका नाम प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना है। फेज वन में सीधे में सड़क की चौड़ाई 5 मीटर और मोड़ पर यही चौड़ाई 7 मीटर होनी चाहिए। दुर्घटना को रोकने के लिए सड़क के किनारे निर्माण के दौरान ही पैरापिट लगाना भी जरूरी है। सड़क की गुणवत्ता जांचने के लिए बाकायदा नेशनल क्वालिटी मॉनिटर (एनक्यूएम) की टीम होती है, जिसमें दूसरे राज्य से चीफ इंजीनियर या फिर रिटायर्ड ईएनसी स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं।