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मंदिरों या स्मारकों तक सीमित नहीं धरोहर : भोबडे
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पनारसा कॉलेज में धरोहर संरक्षण पर वैश्विक कार्यशाला शुरू
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। राजकीय महाविद्यालय पनारसा की ओर से हेरिटेज फाउंडेशन पुणे के सहयोग से धरोहर के संरक्षण के माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा देने पर सात दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कार्यशाला में ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, बांग्लादेश, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया तथा अमेरिका सहित विभिन्न देशों के विशेषज्ञों की सहभागिता रही। विशेष रूप से महाविद्यालय के 51 विद्यार्थियों समेत समस्त संकाय सदस्य कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।
मुख्य वक्ता भुजंग रामाराव भोबडे ने कहा कि धरोहर केवल मंदिरों या स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि नदियों, परंपराओं और दैनिक जीवन से भी जुड़ी होती है। उन्होंने ज्ञान को जीवन में लागू करने तथा नैतिक उन्नयन के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व पर बल दिया। दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलिया से जुड़ीं कंचन आमटे जोशी ने भारतीय पारंपरिक कला पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय लोककला गुफा चित्रों से लेकर मधुबनी और पट्टचित्र जैसी शैलियों तक, कहानी, प्रकृति और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कलाकृतियों को कीटों, तेज धूप, नमी तथा भौतिक क्षति से बचाने के साथ-साथ आधुनिक संरक्षण तकनीकों के उपयोग पर बल दिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। राजकीय महाविद्यालय पनारसा की ओर से हेरिटेज फाउंडेशन पुणे के सहयोग से धरोहर के संरक्षण के माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा देने पर सात दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कार्यशाला में ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, बांग्लादेश, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया तथा अमेरिका सहित विभिन्न देशों के विशेषज्ञों की सहभागिता रही। विशेष रूप से महाविद्यालय के 51 विद्यार्थियों समेत समस्त संकाय सदस्य कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।
मुख्य वक्ता भुजंग रामाराव भोबडे ने कहा कि धरोहर केवल मंदिरों या स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि नदियों, परंपराओं और दैनिक जीवन से भी जुड़ी होती है। उन्होंने ज्ञान को जीवन में लागू करने तथा नैतिक उन्नयन के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व पर बल दिया। दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलिया से जुड़ीं कंचन आमटे जोशी ने भारतीय पारंपरिक कला पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय लोककला गुफा चित्रों से लेकर मधुबनी और पट्टचित्र जैसी शैलियों तक, कहानी, प्रकृति और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कलाकृतियों को कीटों, तेज धूप, नमी तथा भौतिक क्षति से बचाने के साथ-साथ आधुनिक संरक्षण तकनीकों के उपयोग पर बल दिया।
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