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मूर्छित होने के बाद फिर खड़ा हुआ नड़
Updated Sun, 30 Sep 2018 07:04 PM IST
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कुल्लू/खराहल। बिजली महादेव में मूर्छित नड़ को देवता ने करीब आधा घंटे के बाद होश में लाकर फिर से खड़ा कर दिया। इस दौरान दाह संस्कार में इस्तेमाल होने वाले पंचरत्न और दस द्वारों की भी पूरी व्यवस्था थी। लेकिन जीत दैवीय शक्ति की हुई। यह सब रविवार को कुल्लू के बिजली महादेव मंदिर में आयोजित काहिका उत्सव में हुआ। बिजली महादेव मंदिर में तीन साल बाद काहिका उत्सव मनाया गया।
रविवार को शाम साढ़े चार बजे बिजली महादेव मंदिर से 400 मीटर की दूरी पर चिहिन्त स्थान खनाकड़ा तक नड़ को देवता ने अपने साथ ढोल-नगाड़ों, शहनाई और नरसिंगों की मंगल ध्वनि के बीच लाया। सबसे पहले हवा में बंदूक से फायर किया गया। इसके बाद देवता के मुख्य कारकून ने धनुष पर बाण चढ़ाकर इसे दैवीय शक्ति से विपरीत दिशा में दागा। तीर के छूटते ही नड़ प्रकाश मूर्छित होकर जमीन पर गिर गया। कफन ओढ़ा कर इसका जनाजा काहिका मंडप तक निकाला। नड़ की पत्नी के आग्रह पर बिजली महादेव और माहंटी ने उसे होश में लाकर फिर से खड़ा कर दिया। कुछ क्षण ऐसे बीते मानों वहां पर कोई परिंदा भी नहीं है। सभी शांत, मौन, चिंतित और भयभीत थे। नड़ को होश में लाने की प्रक्रिया करीब आधा घंटे तक चली। देवता के गुर ने नड़ पर पवित्र जल मंत्रित कर छिड़का। जल छिड़कते ही प्रकाश होश में आ गया और सैकड़ों लोगों के शीश देवताओं के चरणों में नतमस्तक हुए। इस दौरान भारी संख्या में लोगों की भीड़ रही।
...तो सारी संपत्ति नड़ की पत्नी को
खराहल (कुल्लू)। देवता के कारदार अमर नाथ और मंदिर कमेटी के सचिव हेमराज शर्मा तथा खराहल पंचायत के पूर्व प्रधान चुनी लाल, सेउगी पंचायत के पूर्व प्रधान ईश्वरी शर्मा का कहना है कि काहिका उत्सव का आयोजन देव परंपरानुसार के अनुसार सदियों से किया जा रहा है। उनके अनुसार अगर किसी सूरत में मूर्छित नड़ होश में नहीं आता व मर जाए तो देवता के रथ की संपत्ति नड़ की पत्नी को देने का विधान है। अभी ऐसा नहीं हुआ है। कहा कि कुल्लू में कई क्षेत्रों में तीन साल बाद तो कहीं पर 12 वर्ष बाद भी काहिका उत्स्व मनाया जाता है। उत्सव में दूरदराज क्षेत्र से सैकड़ों लोग भी देवी-देवताओं से सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इलाके की सुख समृद्धि के लिए काहिका का आयोजन देव आदेश के अनुसार किया जाता है।
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रविवार को शाम साढ़े चार बजे बिजली महादेव मंदिर से 400 मीटर की दूरी पर चिहिन्त स्थान खनाकड़ा तक नड़ को देवता ने अपने साथ ढोल-नगाड़ों, शहनाई और नरसिंगों की मंगल ध्वनि के बीच लाया। सबसे पहले हवा में बंदूक से फायर किया गया। इसके बाद देवता के मुख्य कारकून ने धनुष पर बाण चढ़ाकर इसे दैवीय शक्ति से विपरीत दिशा में दागा। तीर के छूटते ही नड़ प्रकाश मूर्छित होकर जमीन पर गिर गया। कफन ओढ़ा कर इसका जनाजा काहिका मंडप तक निकाला। नड़ की पत्नी के आग्रह पर बिजली महादेव और माहंटी ने उसे होश में लाकर फिर से खड़ा कर दिया। कुछ क्षण ऐसे बीते मानों वहां पर कोई परिंदा भी नहीं है। सभी शांत, मौन, चिंतित और भयभीत थे। नड़ को होश में लाने की प्रक्रिया करीब आधा घंटे तक चली। देवता के गुर ने नड़ पर पवित्र जल मंत्रित कर छिड़का। जल छिड़कते ही प्रकाश होश में आ गया और सैकड़ों लोगों के शीश देवताओं के चरणों में नतमस्तक हुए। इस दौरान भारी संख्या में लोगों की भीड़ रही।
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...तो सारी संपत्ति नड़ की पत्नी को
खराहल (कुल्लू)। देवता के कारदार अमर नाथ और मंदिर कमेटी के सचिव हेमराज शर्मा तथा खराहल पंचायत के पूर्व प्रधान चुनी लाल, सेउगी पंचायत के पूर्व प्रधान ईश्वरी शर्मा का कहना है कि काहिका उत्सव का आयोजन देव परंपरानुसार के अनुसार सदियों से किया जा रहा है। उनके अनुसार अगर किसी सूरत में मूर्छित नड़ होश में नहीं आता व मर जाए तो देवता के रथ की संपत्ति नड़ की पत्नी को देने का विधान है। अभी ऐसा नहीं हुआ है। कहा कि कुल्लू में कई क्षेत्रों में तीन साल बाद तो कहीं पर 12 वर्ष बाद भी काहिका उत्स्व मनाया जाता है। उत्सव में दूरदराज क्षेत्र से सैकड़ों लोग भी देवी-देवताओं से सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इलाके की सुख समृद्धि के लिए काहिका का आयोजन देव आदेश के अनुसार किया जाता है।
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